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Nityaनित्य

ॐ जय शिव ओंकारा

Om Jai Shiv Omkara

ॐ जय शिव ओंकारा भगवान शिव की सबसे ज़्यादा गाई जाने वाली हिंदी आरतियों में से एक है। इसकी टेक और ग्यारह पदों में शिव को ओंकार स्वरूप कहा गया है, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव एक हैं। अंतिम पद में स्वामी शिवानंद का नाम आता है। शिव पूजा के अंत में दीपक से यह आरती उतारी जाती है, ख़ासकर सोमवार, सावन और महाशिवरात्रि पर।

टेक

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

हे ओंकार स्वरूप शिव, आपकी जय हो! हे स्वामी, आपकी जय हो। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव हैं, और आपने अपनी अर्धांगिनी (पार्वती) को अपने आधे अंग में धारण किया है।

पद १

एकानन चतुरानन पंचानन राजे।

हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥

आप एक मुख (विष्णु), चार मुख (ब्रह्मा) और पाँच मुख (शिव) वाले रूपों में शोभा पाते हैं; हंस, गरुड़ और वृषभ आपके वाहन बनकर सजते हैं।

टेक

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

पद २

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।

त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥

दो भुजाओं, चार भुजाओं और दस भुजाओं वाले आपके रूप अत्यंत शोभायमान हैं; आपके त्रिगुणात्मक रूप को निहारकर तीनों लोकों के प्राणी मोहित हो जाते हैं।

टेक

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

पद ३

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।

चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी॥

आप रुद्राक्ष की अक्षमाला, वनपुष्पों की वनमाला और मुण्डों की माला धारण करते हैं; चंदन और कस्तूरी आपको शोभित करते हैं और आपके मस्तक पर चंद्रमा विराजता है।

टेक

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

पद ४

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।

सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥

आपके अंगों पर श्वेत वस्त्र, पीतांबर और बाघंबर शोभित हैं; सनक आदि ऋषि, गरुड़ आदि और भूत-गण सदा आपके साथ रहते हैं।

टेक

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

पद ५

कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूलधारी।

सुखकारी दुखहारी जगपालनकारी॥

आपके हाथों में कमंडलु, चक्र और त्रिशूल हैं; आप सुख देने वाले, दुःख हरने वाले और जगत का पालन करने वाले हैं।

टेक

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

पद ६

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥

अविवेकी लोग ही ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को अलग-अलग जानते हैं; प्रणव अक्षर ॐ में ये तीनों एक ही हैं।

टेक

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

पद ७

लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।

पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥

लक्ष्मी, सावित्री और पार्वती आपके साथ हैं; पार्वती आपकी अर्धांगिनी हैं और गंगा शिव की लहर बनकर बहती हैं।

टेक

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

पद ८

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।

भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥

पर्वत पर पार्वती शोभा पाती हैं और शंकर कैलास पर विराजते हैं; भांग और धतूरा उनका भोजन है और भस्म में उनका वास है।

टेक

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

पद ९

जटा में गंगा बहत है, गल मुण्डन माला।

शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥

आपकी जटाओं में गंगा बहती हैं और गले में मुण्डों की माला है; शेषनाग आपसे लिपटे रहते हैं और आप मृगछाला ओढ़ते हैं।

टेक

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

पद १०

काशी में विराजे विश्वनाथ, नंदी ब्रह्मचारी।

नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥

काशी में आप विश्वनाथ के रूप में विराजते हैं, ब्रह्मचारी नंदी आपके सामने हैं; जो नित्य उठकर आपके दर्शन पाते हैं, उनके लिए आपकी महिमा अपार है।

टेक

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

पद ११

त्रिगुणस्वामी जी की आरती, जो कोई नर गावे।

कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥

स्वामी शिवानंद कहते हैं कि जो कोई त्रिगुणों के स्वामी (शिव) की यह आरती गाता है, उसे मनोवांछित फल मिलता है।

टेक

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

स्रोत: Traditional Hindi aarti; full sung form as given by drikpanchang.com "Shri Shiv Ji Ki Aarti", cross-checked with revivingcultures.com, hindi.webdunia.com and shivchalisahindi.com

ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।

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