श्री लक्ष्मी चालीसा
Lakshmi Chalisa
श्री लक्ष्मी चालीसा देवी लक्ष्मी की सरल अवधी-हिंदी में चालीस चौपाइयों की स्तुति है, जिसके आरंभ में दोहा और सोरठा और अंत में दो दोहे हैं। इसमें क्षीरसागर से उनके प्रकट होने और सीता रूप में जन्म लेने की कथा है, और उनसे भक्त के हृदय और घर में बसने की विनती है। परिवार इसे शुक्रवार, शरद पूर्णिमा और दीपावली की रात पढ़ते हैं।
- 44 पद
- 10 मिनट
- पारंपरिक; अंतिम पदों में "रामदास" की छाप
- उत्तम दिन: शुक्रवार
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास।Matu Lakshmi Kari Kripa, Karo Hriday Mein Vaas
मनोकामना सिद्ध करि, पुरवहु मेरी आस॥Manokamna Siddh Kari, Puravahu Meri Aas
हे माता लक्ष्मी, कृपा करके मेरे हृदय में निवास कीजिए। मेरी मनोकामना सिद्ध करके मेरी आशा पूरी कीजिए।
भक्ति भारत और एस्ट्रोसेज में "परुवहु" छपा है, जो "पुरवहु" (पूरी कीजिए) की चूक है; sanskritdocuments.org और शुभ पंचांग में "पुरवहु" है। sanskritdocuments.org और भारतकोश एक दूसरा आरंभिक दोहा "सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार" भी देते हैं, जो बाकी स्रोतों में नहीं है; हमने भी उसे छोड़ा है।
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूँ।Yahi Mor Ardas, Haath Jod Vinti Karun
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥Sab Vidhi Karau Suvas, Jai Janani Jagdambika
यही मेरी अरदास है, मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ: हर प्रकार से मेरे यहाँ निवास कीजिए। हे जननी जगदंबिका, आपकी जय हो।
सोरठा उलटा दोहा है, जिसमें तुक पंक्ति के बीच में आती है (अरदास / सुवास)।
सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही।Sindhu Suta Main Sumirau Tohi
ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोही॥Gyan Buddhi Vidya Do Mohi
हे समुद्र की पुत्री, मैं आपका स्मरण करता हूँ। मुझे ज्ञान, बुद्धि और विद्या दीजिए।
तुम समान नहिं कोई उपकारी।Tum Saman Nahin Koi Upkari
सब विधि पुरवहु आस हमारी॥Sab Vidhi Puravahu Aas Hamari
आपके समान कोई उपकार करने वाला नहीं है। हर प्रकार से हमारी आशा पूरी कीजिए।
जय जय जगत जननि जगदम्बा।Jai Jai Jagat Janani Jagdamba
सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥Sabki Tum Hi Ho Avalamba
हे जगत की जननी जगदंबा, आपकी जय हो, जय हो। आप ही सबका सहारा हैं।
sanskritdocuments.org और भारतकोश में "सबके तुमही हो स्वलम्बा" छपा है; हमने भक्ति भारत, एस्ट्रोसेज और शुभ पंचांग का "सबकी तुम ही हो अवलम्बा" लिया है।
तुम ही हो सब घट घट वासी।Tum Hi Ho Sab Ghat Ghat Vasi
विनती यही हमारी खासी॥Vinti Yahi Hamari Khasi
आप ही हर हृदय में निवास करती हैं। यही हमारी विशेष विनती है।
जगजननी जय सिन्धु कुमारी।Jag Janani Jai Sindhu Kumari
दीनन की तुम हो हितकारी॥Deenan Ki Tum Ho Hitkari
हे जगजननी, हे सिंधु कुमारी, आपकी जय हो। आप दीनों का हित करने वाली हैं।
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी।Vinvau Nitya Tumahin Maharani
कृपा करौ जग जननि भवानी॥Kripa Karau Jag Janani Bhavani
हे महारानी, मैं नित्य आपसे विनती करता हूँ। हे जगजननी भवानी, कृपा कीजिए।
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी।Kehi Vidhi Stuti Karau Tihari
सुधि लीजै अपराध बिसारी॥Sudhi Lijai Apradh Bisari
मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? मेरे अपराध भुलाकर मेरी सुध लीजिए।
कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी।Kripa Drishti Chitavo Mam Ori
जगजननी विनती सुन मोरी॥Jag Janani Vinti Sun Mori
मेरी ओर कृपा दृष्टि से देखिए। हे जगजननी, मेरी विनती सुनिए।
ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता।Gyan Buddhi Jai Sukh Ki Data
संकट हरो हमारी माता॥Sankat Haro Hamari Mata
हे ज्ञान, बुद्धि और सुख देने वाली, आपकी जय हो। हे माता, हमारे संकट हर लीजिए।
क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो।Ksheer Sindhu Jab Vishnu Mathayo
चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥Chaudah Ratna Sindhu Mein Payo
जब विष्णु ने क्षीरसागर का मंथन करवाया, तब समुद्र में चौदह रत्न मिले।
समुद्र मंथन के चौदह रत्नों में लक्ष्मी, चंद्रमा, अमृत, कौस्तुभ मणि, कामधेनु, कल्पवृक्ष आदि गिने जाते हैं।
चौदह रत्न में तुम सुखरासी।Chaudah Ratna Mein Tum Sukhrasi
सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥Seva Kiyo Prabhu Bani Dasi
चौदह रत्नों में आप सुख की राशि थीं; आपने दासी बनकर प्रभु की सेवा की।
sanskritdocuments.org और भारतकोश में "प्रभु" के स्थान पर "प्रभुहिं" है।
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा।Jab Jab Janam Jahan Prabhu Linha
रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥Roop Badal Tahan Seva Kinha
प्रभु ने जब-जब जहाँ जन्म लिया, आपने रूप बदलकर वहाँ उनकी सेवा की।
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा।Swayam Vishnu Jab Nar Tanu Dhara
लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥Linheu Avadhpuri Avatara
जब स्वयं विष्णु ने मनुष्य शरीर धारण किया, तब अयोध्या में अवतार लिया।
तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं।Tab Tum Pragat Janakpur Mahin
सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥Seva Kiyo Hriday Pulkahin
तब आप जनकपुर में (सीता रूप में) प्रकट हुईं और पुलकित हृदय से उनकी सेवा की।
अपनायो तोहि अन्तर्यामी।Apnayo Tohi Antaryami
विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥Vishva Vidit Tribhuvan Ki Swami
अंतर्यामी प्रभु ने आपको अपनाया; आप विश्व में प्रसिद्ध, तीनों लोकों की स्वामिनी हैं।
तुम सम प्रबल शक्ति नहिं आनी।Tum Sam Prabal Shakti Nahin Aani
कहँ लौं महिमा कहौं बखानी॥Kahan Lau Mahima Kahau Bakhani
आपके समान प्रबल शक्ति और कोई नहीं। मैं आपकी महिमा का कहाँ तक बखान करूँ?
sanskritdocuments.org में "तुम सब" और "कहँ तक" है; हमने भक्ति भारत और शुभ पंचांग का पाठ ("तुम सम", "कहँ लौं") लिया है।
मन क्रम वचन करै सेवकाई।Man Kram Vachan Karai Sevkai
मन इच्छित वांछित फल पाई॥Man Ichchhit Vanchhit Phal Pai
जो मन, कर्म और वचन से आपकी सेवा करता है, वह मनचाहा फल पाता है।
तजि छल कपट और चतुराई।Taji Chhal Kapat Aur Chaturai
पूजहिं विविध भाँति मन लाई॥Poojahin Vividh Bhanti Man Lai
छल, कपट और चतुराई छोड़कर जो मन लगाकर अनेक प्रकार से आपकी पूजा करते हैं।
और हाल मैं कहौं बुझाई।Aur Haal Main Kahau Bujhai
जो यह पाठ करै मन लाई॥Jo Yah Path Karai Man Lai
और एक बात मैं समझाकर कहता हूँ: जो मन लगाकर यह पाठ करता है,
ताको कोई कष्ट न होई।Tako Koi Kasht Na Hoi
मन इच्छित पावै फल सोई॥Man Ichchhit Pavai Phal Soi
उसे कोई कष्ट नहीं होता और वह मनचाहा फल पाता है।
भक्ति भारत और एस्ट्रोसेज में "कष्ट नोई" छपा है, जो "कष्ट न होई" (sanskritdocuments.org, शुभ पंचांग) की चूक है।
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि।Trahi Trahi Jai Dukh Nivarini
त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥Trividh Taap Bhav Bandhan Harini
रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए! हे दुःख दूर करने वाली, आपकी जय हो। आप तीनों प्रकार के ताप और संसार के बंधन हरती हैं।
त्रिविध ताप: दैहिक (शरीर-मन से), भौतिक (दूसरे प्राणियों से) और दैविक (प्रकृति और भाग्य से)।
जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै।Jo Chalisa Padhai Padhavai
ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥Dhyan Lagakar Sunai Sunavai
जो यह चालीसा पढ़ता या पढ़वाता है, और ध्यान लगाकर सुनता या सुनाता है,
sanskritdocuments.org में लंबी पंक्ति है: "जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥"।
ताकौ कोई न रोग सतावै।Takau Koi Na Rog Satavai
पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥Putra Aadi Dhan Sampatti Pavai
उसे कोई रोग नहीं सताता, और वह पुत्र आदि, धन और संपत्ति पाता है।
पुत्रहीन अरु सम्पति हीना।Putraheen Aru Sampati Heena
अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥Andh Badhir Kodhi Ati Deena
जो पुत्रहीन या संपत्तिहीन हैं, अंधे, बहरे, कोढ़ी या अत्यंत दीन हैं,
विप्र बोलाय कै पाठ करावै।Vipra Bolay Kai Path Karavai
शंका दिल में कभी न लावै॥Shanka Dil Mein Kabhi Na Lavai
वे ब्राह्मण को बुलाकर इसका पाठ करवाएँ और मन में कभी शंका न लाएँ।
पाठ करावै दिन चालीसा।Path Karavai Din Chalisa
ता पर कृपा करैं गौरीसा॥Ta Par Kripa Karain Gaurisa
जो चालीस दिन तक पाठ करवाता है, उस पर गौरीश कृपा करते हैं।
गौरीश यानी गौरी के स्वामी, सामान्यतः शिव का नाम। हमारे सभी स्रोतों में पंक्ति ऐसी ही है।
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै।Sukh Sampatti Bahut Si Pavai
कमी नहीं काहू की आवै॥Kami Nahin Kahu Ki Aavai
वह बहुत सा सुख और संपत्ति पाता है, और उसे किसी चीज़ की कमी नहीं रहती।
बारह मास करै जो पूजा।Barah Maas Karai Jo Pooja
तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥Tehi Sam Dhanya Aur Nahin Dooja
जो बारहों महीने पूजा करता है, उसके समान धन्य दूसरा कोई नहीं।
प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं।Pratidin Path Karai Man Mahin
उन सम कोइ जग में कहुँ नाहीं॥Un Sam Koi Jag Mein Kahun Nahin
जो प्रतिदिन मन ही मन पाठ करता है, उसके समान संसार में कहीं कोई नहीं।
बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई।Bahuvidhi Kya Main Karau Badai
लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥Ley Pariksha Dhyan Lagai
मैं इसकी बहुत प्रकार से क्या बड़ाई करूँ? ध्यान लगाकर स्वयं परख लीजिए।
करि विश्वास करै व्रत नेमा।Kari Vishvas Karai Vrat Nema
होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥Hoy Siddh Upjai Ur Prema
जो विश्वास करके व्रत और नियम का पालन करता है, उसे सिद्धि मिलती है और हृदय में प्रेम उपजता है।
जय जय जय लक्ष्मी भवानी।Jai Jai Jai Lakshmi Bhavani
सब में व्यापित हो गुण खानी॥Sab Mein Vyapit Ho Gun Khani
हे लक्ष्मी भवानी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! हे गुणों की खान, आप सबमें व्याप्त हैं।
sanskritdocuments.org और भारतकोश में "लक्ष्मी महारानी ... जो गुण खानी" है।
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं।Tumhro Tej Prabal Jag Mahin
तुम सम कोउ दयालु कहुँ नाहीं॥Tum Sam Kou Dayalu Kahun Nahin
संसार में आपका तेज प्रबल है। आपके समान दयालु कहीं कोई नहीं।
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै।Mohi Anath Ki Sudhi Ab Lijai
संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥Sankat Kaati Bhakti Mohi Dijai
मुझ अनाथ की अब सुध लीजिए। मेरे संकट काटकर मुझे भक्ति दीजिए।
भूल चूक करि क्षमा हमारी।Bhool Chook Kari Kshama Hamari
दर्शन दीजै दशा निहारी॥Darshan Dijai Dasha Nihari
हमारी भूल-चूक क्षमा कीजिए। हमारी दशा देखकर दर्शन दीजिए।
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी।Bin Darshan Vyakul Adhikari
तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥Tumahi Achhat Dukh Sahte Bhari
आपके दर्शन बिना भक्त व्याकुल है; आपके रहते हुए भी भारी दुःख सह रहा है।
"अछत" यानी "(आपके) रहते हुए"। sanskritdocuments.org और भारतकोश में "अक्षत" छपा है।
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में।Nahin Mohin Gyan Buddhi Hai Tan Mein
सब जानत हो अपने मन में॥Sab Janat Ho Apne Man Mein
मुझमें ज्ञान और बुद्धि नहीं है। आप अपने मन में सब जानती हैं।
रूप चतुर्भुज करके धारण।Roop Chaturbhuj Karke Dharan
कष्ट मोर अब करहु निवारण॥Kasht Mor Ab Karahu Nivaran
चतुर्भुज रूप धारण करके अब मेरे कष्ट दूर कीजिए।
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई।Kehi Prakar Main Karau Badai
ज्ञान बुद्धि मोहि नहिं अधिकाई॥Gyan Buddhi Mohi Nahin Adhikai
मैं किस प्रकार आपकी बड़ाई करूँ? मुझमें ज्ञान और बुद्धि अधिक नहीं है।
रामदास अब कहै पुकारी।Ramdas Ab Kahai Pukari
करो दूर तुम विपति हमारी॥Karo Door Tum Vipati Hamari
रामदास अब पुकारकर कहते हैं: आप हमारी विपत्ति दूर कीजिए।
कवि के नाम वाली यह पंक्ति sanskritdocuments.org और भारतकोश में है और इससे गिनती ४० पूरी होती है। भक्ति भारत, एस्ट्रोसेज और शुभ पंचांग में यह नहीं है; वहाँ ३९ चौपाइयाँ हैं।
त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो बेगि सब त्रास।Trahi Trahi Dukh Harini, Haro Begi Sab Traas
जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥Jayati Jayati Jai Lakshmi, Karo Shatru Ko Naash
रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए, हे दुःख हरने वाली! मेरे सब भय शीघ्र दूर कीजिए। हे लक्ष्मी, आपकी जय हो, जय हो, जय हो! शत्रुओं का नाश कीजिए।
"करो शत्रु को नाश" (भक्ति भारत, एस्ट्रोसेज); sanskritdocuments.org और भारतकोश में "करो शत्रुन का नाश", शुभ पंचांग में "करो दुश्मन का नाश"। परंपरा शत्रु से भीतर के शत्रु भी समझती है: लोभ, क्रोध और भय।
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर।Ramdas Dhari Dhyan Nit, Vinay Karat Kar Jor
मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥Matu Lakshmi Das Par, Karahu Daya Ki Kor
रामदास नित्य ध्यान धरकर हाथ जोड़ विनती करते हैं: हे माता लक्ष्मी, अपने दास पर दया की दृष्टि कीजिए।
शुभ पंचांग में यह समापन दोहा नहीं है; बाकी चारों स्रोतों में है।
पूर्ण
श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ पूर्ण हुआ।
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प्रश्न
लक्ष्मी चालीसा कब पढ़ें?
शुक्रवार की शाम घी का दीपक जलाकर पढ़ना परंपरागत है। शरद पूर्णिमा, नवरात्रि और सबसे बढ़कर दीपावली की रात भी इसका पाठ होता है। चालीसा स्वयं चालीस दिन पाठ की बात करती है, जो कुछ परिवार किसी नए शुभ काम से पहले करते हैं।
क्या दीपावली की रात लक्ष्मी पूजन के बाद लक्ष्मी चालीसा पढ़ सकते हैं?
हाँ। बहुत से परिवार पूजन के तुरंत बाद इसे पढ़ते हैं और फिर "ॐ जय लक्ष्मी माता" आरती गाते हैं। इसमें लगभग दस मिनट लगते हैं, इसलिए बच्चे भी आसानी से साथ पढ़ लेते हैं।
लक्ष्मी चालीसा किसने लिखी?
अंतिम चौपाई और समापन दोहे में रामदास का नाम है। नाम के अलावा उनके बारे में कोई विश्वसनीय जानकारी नहीं है; यह चालीसा किसी एक पांडुलिपि से नहीं, छपी पुस्तिकाओं से हम तक पहुँची है।
क्या लक्ष्मी चालीसा और लक्ष्मी आरती एक ही हैं?
नहीं। आरती "ॐ जय लक्ष्मी माता" दीपक घुमाते हुए गाया जाने वाला छोटा गीत है। चालीसा चालीस चौपाइयों की लंबी स्तुति है, जो प्रायः आरती से पहले पढ़ी जाती है।
स्रोत और समीक्षा
स्रोत: Shri Lakshmi Chalisa as printed in popular aarti-chalisa booklets; text compared line by line across BhaktiBharat.com, AstroSage, Shubh Panchang (shubhpanchang.com), sanskritdocuments.org (laxmi40.itx) and Bharatkosh (bharatdiscovery.org). No Gita Press printing was available to us.
Online editions fall into two families. BhaktiBharat, AstroSage and Shubh Panchang have the sortha and 39 chaupais; sanskritdocuments.org and Bharatkosh (whose texts match each other closely) add an extra opening couplet ("सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार", left out here) and a 40th chaupai with the poet's name ("रामदास अब कहै पुकारी", included as chaupai 40; Bharatkosh reads "कहाई"). Each line follows the reading of the majority of sources; variants are noted under ch. 3, 11, 16, 20, 22, 32, 36 and the closing doha. Obvious slips corrected: "परुवहु" to "पुरवहु" (doha 1), "कष्ट नोई" to "कष्ट न होई" (ch. 20), "चितववो" to "चितवो" (ch. 8), "दजै" to "दीजै" (ch. 35). Order of ch. 36 to 39 follows BhaktiBharat and sanskritdocuments.org (Shubh Panchang places "केहि प्रकार" earlier). A scholar should compare this with a printed booklet.
मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।
ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।