श्रीसूक्तम्
Shri Suktam
श्रीसूक्त देवी लक्ष्मी की सबसे प्राचीन स्तुति है: ऋग्वेद के खिल (परिशिष्ट) सूक्तों में आने वाले पंद्रह मंत्र। इसमें अग्निदेव से विनती है कि वे स्वर्णमयी, कभी न जाने वाली लक्ष्मी को घर में लाएँ और दरिद्रता को दूर करें। सोलहवाँ श्लोक, जो यहाँ दिया गया है, इन पंद्रह मंत्रों के नित्य जप की विधि बताता है; लक्ष्मी पूजन, शुक्रवार और दीपावली की रात इसका पाठ होता है।
- 16 पद
- 6 मिनट
- वैदिक (ऋग्वेद खिल); परंपरा में ऋषि आनंद, कर्दम, चिक्लीत और श्रीद बताए जाते हैं
- उत्तम दिन: शुक्रवार
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।Hiranyavarnam Harinim Suvarna Rajata Srajam
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥Chandram Hiranmayim Lakshmim Jatavedo Ma Avaha
हे जातवेद अग्निदेव, स्वर्ण जैसे वर्ण वाली, दीप्तिमान, सोने और चाँदी की मालाएँ धारण करने वाली, चंद्रमा जैसी आह्लादकारी, स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे पास ले आइए।
- हिरण्यवर्णाम्स्वर्ण जैसे वर्ण वाली
- हरिणीम्दीप्तिमान, दुःख हरने वाली
- सुवर्णरजतस्रजाम्सोने और चाँदी की मालाएँ पहने
- चन्द्राम्चंद्रमा जैसी आह्लाद देने वाली
- हिरण्मयीम्स्वर्णमयी
- लक्ष्मीम्लक्ष्मी को
- जातवेदःहे जातवेद (सर्वज्ञ अग्निदेव)
- मेमेरे लिए
- आवहले आइए
जातवेद अग्नि का नाम है, यानी "जो सब उत्पन्न वस्तुओं को जानता है"। वैदिक पूजा में अग्नि ही देवताओं तक आहुति और प्रार्थना पहुँचाते हैं, इसलिए सूक्त अग्नि से लक्ष्मी को लाने की विनती करता है।
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।Tam Ma Avaha Jatavedo Lakshmim Anapagaminim
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥Yasyam Hiranyam Vindeyam Gamashvam Purushanaham
हे जातवेद, उन लक्ष्मी को मेरे पास ले आइए जो कभी दूर न जाएँ, जिनकी कृपा से मैं स्वर्ण, गौएँ, घोड़े और परिजन-सहायक प्राप्त करूँ।
- ताम्उन
- मेमेरे लिए
- आवहले आइए
- जातवेदःहे जातवेद (सर्वज्ञ अग्निदेव)
- लक्ष्मीम्लक्ष्मी को
- अनपगामिनीम्जो कभी दूर न जाएँ
- यस्याम्जिनके आने पर
- हिरण्यम्स्वर्ण
- विन्देयम्मैं प्राप्त करूँ
- गाम् अश्वम्गाय और घोड़े
- पुरुषान् अहम्मैं, परिजन और सहायक
वैदिक काल में गाय और घोड़े ही मुख्य धन थे। यहाँ "पुरुष" का अर्थ घर के लोग हैं: संतान, परिजन और सहायक।
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम्।Ashvapurvam Rathamadhyam Hastinada Prabodhinim
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मादेवीर्जुषताम्॥Shriyam Devim Upahvaye Shrirma Devirjushatam
जिनके आगे घोड़े चलते हैं, जो रथों के बीच विराजती हैं और जिनके आगमन की सूचना हाथियों की चिंघाड़ देती है, उन श्री देवी का मैं आवाहन करता हूँ। श्री देवी मुझ पर प्रसन्न हों।
- अश्वपूर्वाम्जिनके आगे घोड़े चलते हैं
- रथमध्याम्रथों के बीच विराजमान
- हस्तिनादप्रबोधिनीम्हाथियों की चिंघाड़ से जिनके आगमन की सूचना मिलती है
- श्रियम्श्री (लक्ष्मी) को
- देवीम्देवी को
- उपह्वयेआवाहन करता हूँ
- श्रीः मा देवी जुषताम्श्री देवी मुझ पर प्रसन्न हों
गजलक्ष्मी (हाथियों के साथ लक्ष्मी) के चित्र का मूल यही मंत्र माना जाता है। दूसरी पंक्ति दोनों स्रोतों में "श्रीर्मादेवीर्जुषताम्" छपी है, जिसे श्रीः मा देवी जुषताम् पढ़ा जाता है।
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।Kam Sosmitam Hiranya Prakaram Ardram Jvalantim Triptam Tarpayantim
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥Padme Sthitam Padmavarnam Tamihopahvaye Shriyam
जो स्वयं आनंद स्वरूप हैं, मंद मुस्कान वाली हैं, स्वर्ण के परकोटे में रहती हैं, करुणा से आर्द्र और प्रकाशमान हैं, स्वयं तृप्त हैं और सबको तृप्त करती हैं, कमल पर स्थित और कमल के रंग वाली हैं, उन श्री का मैं यहाँ आवाहन करता हूँ।
- काम्जो स्वयं आनंद स्वरूप हैं
- सोस्मिताम्मंद मुस्कान वाली
- हिरण्यप्राकाराम्स्वर्ण के परकोटे से घिरी
- आर्द्राम्करुणा से आर्द्र
- ज्वलन्तीम्प्रकाशमान
- तृप्ताम्स्वयं तृप्त
- तर्पयन्तीम्दूसरों को तृप्त करने वाली
- पद्मे स्थिताम्कमल पर स्थित
- पद्मवर्णाम्कमल के रंग वाली
- ताम्उन
- इह उपह्वयेयहाँ आवाहन करता हूँ
- श्रियम्श्री (लक्ष्मी) को
"काम्" को सामान्य अर्थ में "उन्हें" भी पढ़ा जा सकता है; पारंपरिक भाष्यकार इसे "आनंद" (क = सुख) बताते हैं। दोनों स्रोतों में "सोस्मितां" छपा है।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।Chandram Prabhasam Yashasa Jvalantim Shriyam Loke Devajushtam Udaram
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥Tam Padminimim Sharanamaham Prapadye Alakshmirme Nashyatam Tvam Vrine
चंद्रमा जैसी आह्लादकारी, प्रभा से युक्त, यश से दमकती, संसार में देवताओं द्वारा सेवित, उदार, कमल धारण करने वाली उन श्री की मैं शरण लेता हूँ। मेरी दरिद्रता नष्ट हो। मैं आपको वरण करता हूँ।
- चन्द्राम्चंद्रमा जैसी आह्लाद देने वाली
- प्रभासाम्प्रभा से युक्त
- यशसा ज्वलन्तीम्यश से दमकती
- श्रियम्श्री (लक्ष्मी) को
- लोके देवजुष्टाम्संसार में देवताओं द्वारा सेवित
- उदाराम्उदार
- पद्मिनीम् ईम्कमल धारण करने वाली उन्हें
- शरणम् अहं प्रपद्येमैं शरण लेता हूँ
- अलक्ष्मीः मे नश्यताम्मेरी दरिद्रता नष्ट हो
- त्वां वृणेमैं आपको वरण करता हूँ
अलक्ष्मी यानी लक्ष्मी का उलटा: दरिद्रता, दुर्भाग्य और वह सब जो समृद्धि को दूर भगाता है।
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।Adityavarne Tapasodhijato Vanaspatistava Vrikshotha Bilvah
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥Tasya Phalani Tapasa Nudantu Mayantarayashcha Bahya Alakshmih
हे सूर्य जैसी कांति वाली देवी, आपके तप से वनों का राजा बेल का वृक्ष उत्पन्न हुआ, जो आपका अपना वृक्ष है। उसके फल अपनी तपःशक्ति से मेरे भीतर के अज्ञान और बाहर की दरिद्रता को दूर करें।
- आदित्यवर्णेहे सूर्य जैसी कांति वाली
- तपसः अधिजातःआपके तप से उत्पन्न
- वनस्पतिःवनस्पति, वन का राजा
- तव वृक्षःआपका वृक्ष
- अथ बिल्वःबेल
- तस्य फलानिउसके फल
- तपसा नुदन्तुअपने तप से दूर करें
- मायाः अन्तराःभीतर का अज्ञान
- च बाह्याः अलक्ष्मीःऔर बाहर की दरिद्रता
बेल का वृक्ष शिव के साथ लक्ष्मी को भी प्रिय है। इसी कारण लक्ष्मी हवन में बेलपत्र और बेल फल अर्पित किए जाते हैं।
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।Upaitu Mam Devasakhah Kirtishcha Manina Saha
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥Pradurbhutosmi Rashtresmin Kirtim Riddhim Dadatu Me
देवताओं के सखा कीर्ति और मणि के साथ मेरे पास आएँ। मैं इस देश में जन्मा हूँ; वे मुझे यश और समृद्धि प्रदान करें।
- उपैतु माम्मेरे पास आएँ
- देवसखःदेवताओं के सखा (परंपरा के अनुसार कुबेर)
- कीर्तिः चऔर कीर्ति
- मणिना सहमणि के साथ
- प्रादुर्भूतः अस्मिमैं जन्मा हूँ
- राष्ट्रे अस्मिन्इस देश में
- कीर्तिम् ऋद्धिम्यश और समृद्धि
- ददातु मेमुझे प्रदान करें
पारंपरिक भाष्यकार "देवसखा" को कुबेर मानते हैं, जो देवताओं के कोषाध्यक्ष और शिव के मित्र हैं, और मणि को उनके धन का रत्न। कीर्ति को यहाँ देवी के रूप में पूजा गया है।
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।Kshutpipasamalam Jyeshtham Alakshmim Nashayamyaham
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्॥Abhutim Asamriddhim Cha Sarvam Nirnuda Me Grihat
भूख, प्यास और मलिनता रूपी ज्येष्ठा अलक्ष्मी को मैं नष्ट करता हूँ। हे देवी, सब प्रकार के अभाव और असमृद्धि को मेरे घर से निकाल दीजिए।
- क्षुत्पिपासामलाम्भूख, प्यास और मलिनता रूपी
- ज्येष्ठाम्बड़ी बहन (ज्येष्ठा)
- अलक्ष्मीम्अलक्ष्मी (दरिद्रता) को
- नाशयामि अहम्मैं नष्ट करता हूँ
- अभूतिम्अभाव
- असमृद्धिम्असमृद्धि
- च सर्वाम्और सबको
- निर्णुद मे गृहात्मेरे घर से निकाल दीजिए
परंपरा के अनुसार समुद्र मंथन में लक्ष्मी से पहले अलक्ष्मी (ज्येष्ठा) निकलीं, इसलिए उन्हें बड़ी बहन कहा गया।
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।Gandhadvaram Duradharsham Nityapushtam Karishinim
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥Ishvarim Sarvabhutanam Tamihopahvaye Shriyam
जो सुगंध से पहचानी जाती हैं, जिन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता, जो सदा पुष्ट और पशुधन व उपज से समृद्ध हैं, जो सब प्राणियों की स्वामिनी हैं, उन श्री का मैं यहाँ आवाहन करता हूँ।
- गन्धद्वाराम्सुगंध से पहचानी जाने वाली
- दुराधर्षाम्जिन्हें कोई पराजित न कर सके
- नित्यपुष्टाम्सदा पुष्ट
- करीषिणीम्पशुधन और उपज से समृद्ध
- ईश्वरीम्स्वामिनी
- सर्वभूतानाम्सब प्राणियों की
- ताम्उन
- इह उपह्वयेयहाँ आवाहन करता हूँ
- श्रियम्श्री (लक्ष्मी) को
करीषिणी शब्द करीष (गोबर) से बना है; खेती वाले घर में यह बहुत से पशुओं और उपजाऊ खेतों का चिह्न था। तैत्तिरीय पाठ-परंपरा में "स" से पहले "ईश्वरीं" को "ईश्वरीग्ं" बोला जाता है; हमारे स्रोत इसे विशेष चिह्न से छापते हैं, हमने सामान्य अनुस्वार लिखा है।
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।Manasah Kamam Akutim Vachah Satyam Ashimahi
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥Pashunam Rupamannasya Mayi Shrih Shrayatam Yashah
हम मन की कामना, हृदय का संकल्प और वाणी की सत्यता प्राप्त करें। पशुओं और अन्न का सौंदर्य, श्री और यश मुझमें निवास करें।
- मनसः कामम्मन की कामना
- आकूतिम्संकल्प
- वाचः सत्यम्वाणी की सत्यता
- अशीमहिहम प्राप्त करें
- पशूनां रूपम्पशुओं का सौंदर्य
- अन्नस्यअन्न का
- मयि श्रयताम्मुझमें निवास करे
- श्रीः यशःश्री और यश
कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम।Kardamena Prajabhuta Mayi Sambhava Kardama
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥Shriyam Vasaya Me Kule Mataram Padmamalinim
हे कर्दम, आपके द्वारा लक्ष्मी संतान वाली हुईं। हे कर्दम, आप मुझमें प्रकट हों और कमल की माला धारण करने वाली माता श्री को मेरे कुल में बसाइए।
- कर्दमेनकर्दम के द्वारा
- प्रजाभूतासंतान वाली हुईं
- मयि सम्भवमुझमें प्रकट हों
- कर्दमहे कर्दम
- श्रियम्श्री (लक्ष्मी) को
- वासय मे कुलेमेरे कुल में बसाइए
- मातरम्माता को
- पद्ममालिनीम्कमल की माला धारण करने वाली
परंपरा कर्दम और चिक्लीत (अगला मंत्र) को श्री के पुत्र और आनंद व श्रीद के साथ इस सूक्त के ऋषि बताती है। कर्दम का शाब्दिक अर्थ गीली मिट्टी है और चिक्लीत का नमी।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।Apah Srijantu Snigdhani Chiklita Vasa Me Grihe
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥Ni Cha Devim Mataram Shriyam Vasaya Me Kule
जल स्निग्ध और पोषक वस्तुएँ उत्पन्न करें। हे चिक्लीत, मेरे घर में निवास कीजिए और देवी माता श्री को मेरे कुल में स्थायी रूप से बसाइए।
- आपः सृजन्तुजल उत्पन्न करें
- स्निग्धानिस्निग्ध, पोषक वस्तुएँ
- चिक्लीतहे चिक्लीत
- वस मे गृहेमेरे घर में रहिए
- नि चऔर स्थायी रूप से
- देवीं मातरं श्रियम्देवी माता श्री को
- वासय मे कुलेमेरे कुल में बसाइए
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।Ardram Pushkarinim Pushtim Pingalam Padmamalinim
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥Chandram Hiranmayim Lakshmim Jatavedo Ma Avaha
हे जातवेद, कृपा से आर्द्र, कमल-सरोवर वाली, पोषण स्वरूपा, सुनहरे वर्ण वाली, कमल की माला पहने, चंद्रमा जैसी आह्लादकारी, स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे पास ले आइए।
- आर्द्राम्कृपा से आर्द्र
- पुष्करिणीम्कमल-सरोवर वाली
- पुष्टिम्पोषण स्वरूपा
- पिङ्गलाम्पीत-सुनहरे वर्ण वाली
- पद्ममालिनीम्कमल की माला वाली
- चन्द्राम्चंद्रमा जैसी आह्लाद देने वाली
- हिरण्मयीम्स्वर्णमयी
- लक्ष्मीम्लक्ष्मी को
- जातवेदःहे जातवेद (सर्वज्ञ अग्निदेव)
- मेमेरे लिए
- आवहले आइए
कुछ पाठ-परंपराओं में मंत्र १३ और १४ की पहली पंक्ति के उत्तरार्ध ("सुवर्णां हेममालिनीम्" / "पिङ्गलां पद्ममालिनीम्") आपस में बदले मिलते हैं। हमारे दोनों स्रोतों में यही क्रम है।
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।Ardram Yah Karinim Yashtim Suvarnam Hemamalinim
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥Suryam Hiranmayim Lakshmim Jatavedo Ma Avaha
हे जातवेद, कृपा से आर्द्र, हाथ में राजदंड धारण करने वाली, सुंदर वर्ण वाली, सोने की माला पहने, सूर्य जैसी तेजस्वी, स्वर्णमयी लक्ष्मी को मेरे पास ले आइए।
- आर्द्राम्कृपा से आर्द्र
- यः करिणीम् यष्टिम्जो हाथ में राजदंड धारण करती हैं
- सुवर्णाम्सुंदर वर्ण वाली
- हेममालिनीम्सोने की माला पहने
- सूर्याम्सूर्य जैसी तेजस्वी
- हिरण्मयीम्स्वर्णमयी
- लक्ष्मीम्लक्ष्मी को
- जातवेदःहे जातवेद (सर्वज्ञ अग्निदेव)
- मेमेरे लिए
- आवहले आइए
"यः करिणीं" का शाब्दिक अर्थ कठिन है। भाष्यकार इसे "जो हाथ में (दंड) धारण करती हैं" समझाते हैं; यष्टि यानी राजदंड या अधिकार का दंड।
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।Tam Ma Avaha Jatavedo Lakshmim Anapagaminim
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान्विन्देयं पुरुषानहम्॥Yasyam Hiranyam Prabhutam Gavo Dasyoshvan Vindeyam Purushanaham
हे जातवेद, उन लक्ष्मी को मेरे पास ले आइए जो कभी दूर न जाएँ, जिनकी कृपा से मैं प्रचुर स्वर्ण, गौएँ, सेविकाएँ, घोड़े और परिजन प्राप्त करूँ।
- ताम्उन
- मेमेरे लिए
- आवहले आइए
- जातवेदःहे जातवेद (सर्वज्ञ अग्निदेव)
- लक्ष्मीम्लक्ष्मी को
- अनपगामिनीम्जो कभी दूर न जाएँ
- यस्याम्जिनके आने पर
- हिरण्यम्स्वर्ण
- प्रभूतम्प्रचुर
- गावःगौएँ
- दास्यःघर की सेविकाएँ
- अश्वान्घोड़े
- विन्देयम्मैं प्राप्त करूँ
- पुरुषान् अहम्मैं, परिजन और सहायक
यह सूक्त का पंद्रहवाँ और अंतिम मूल मंत्र है। इसमें मंत्र २ ही आशीर्वादों की लंबी सूची के साथ दोहराया गया है, ताकि सूक्त जहाँ से शुरू हुआ वहीं पूरा हो।
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।Yah Shuchih Prayato Bhutva Juhuyad Ajyam Anvaham
श्रियः पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्॥Shriyah Panchadasharcham Cha Shrikamah Satatam Japet
जो श्री की कामना करता है, वह पवित्र और संयमी होकर प्रतिदिन अग्नि में घी की आहुति दे और श्री की इन पंद्रह ऋचाओं का सदा जप करे।
- यःजो
- शुचिः प्रयतः भूत्वापवित्र और संयमी होकर
- जुहुयात्आहुति दे
- आज्यम्घी
- अन्वहम्प्रतिदिन
- श्रियः पञ्चदशर्चम्श्री की पंद्रह ऋचाएँ
- श्रीकामःश्री की कामना करने वाला
- सततं जपेत्सदा जप करे
यह सोलहवाँ श्लोक पंद्रह मंत्रों के साथ जुड़ा फलश्रुति (विधि और फल) का श्लोक है। यह स्वयं "पंद्रह ऋचाओं" की बात करता है, इसलिए मूल सूक्त पंद्रह मंत्रों का माना जाता है। दक्षिण भारत के बहुत से पाठ इसके बाद और श्लोक ("पद्मानने पद्म ऊरू", लक्ष्मी गायत्री आदि) भी पढ़ते हैं; हम यहीं रुकते हैं। दोनों स्रोतों में "जुहुयादाज्य मन्वहम्" अलग छपा है; हमने आज्यम् अन्वहम् को जोड़कर लिखा है।
पूर्ण
श्रीसूक्तम् का पाठ पूर्ण हुआ।
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प्रश्न
श्रीसूक्त में कितने मंत्र हैं?
मूल वैदिक सूक्त पंद्रह मंत्रों का है। सोलहवाँ श्लोक "यः शुचिः प्रयतो भूत्वा" इन्हीं पंद्रह के नित्य पाठ की बात करता है, इसलिए वह फलश्रुति का श्लोक माना जाता है। दक्षिण भारत की पुस्तकें इसके बाद और श्लोक जोड़ती हैं, इसलिए कहीं १६, कहीं २२ या २९ की गिनती मिलती है।
क्या श्रीसूक्त ऋग्वेद का है?
यह ऋग्वेद के खिल सूक्तों में है, जो बाद में जोड़े गए और बाष्कल शाखा में सुरक्षित हैं। इसे प्रायः सूक्त ५.८७ के बाद रखा जाता है। भाषा पूरी तरह वैदिक और बहुत प्राचीन है, पर यह दस मंडलों वाली मूल संहिता का भाग नहीं है।
क्या दीपावली की रात लक्ष्मी पूजन के बाद श्रीसूक्त पढ़ सकते हैं?
हाँ, बहुत से परिवार पढ़ते हैं। परंपरा से इसे पूजन के आरंभ में पढ़ा जाता है, हर मंत्र पर देवी को जल, पुष्प या कुमकुम अर्पित करते हुए। आरती के बाद दीपक जलते रहते फिर से पढ़ना भी आम है।
क्या इसके लिए वैदिक स्वर जानना ज़रूरी है?
नहीं। घरों में अधिकतर लोग इसे स्वर के बिना पढ़ते हैं, जैसा इस पृष्ठ पर है, और परंपरा में भक्ति को पहला स्थान है। पुरोहितों की तरह उदात्त-अनुदात्त स्वरों के साथ पढ़ना हो तो किसी गुरु से सीखें।
स्रोत और समीक्षा
स्रोत: Shri Suktam (Rigvediya), sanskritdocuments.org s-sukta.itx and s-sukta-accent.itx (encoded and proofread by Avinash Sathaye, Shree, Anant Upadhyayula, Sunder Hattangadi); cross-checked line by line with "Prabhata Stotranidhi" (stotranidhi.com, Devanagari with svaras)
Mantras 1 to 15 are the Shri Sukta of the Rig Veda Khilani (Bashkala recension; appended after RV 5.87; Scheftelowitz, Die Apokryphen des Rgveda, 2.6). Verse 16 ("यः शुचिः प्रयतो भूत्वा") is the phala verse attached to it; it is not counted among the fifteen. Further appended verses ("पद्मानने पद्म ऊरू", "आनन्दः कर्दमः श्रीदश्चिक्लीत", the Lakshmi Gayatri and others), which both sources print after verse 16 in differing order, are left out. Vedic svara (accent) marks are omitted. The opening "ॐ" printed by sanskritdocuments.org is left out. Both sources agree word for word on mantras 1 to 16 once accents are removed. Spelling choices: "ईश्वरीं" for the sources' "ईश्वरीꣳ" / "ईश्वरीग्ं" (m9); "गन्धद्वारां" (stotranidhi) for "गंधद्वारां" (sanskritdocuments); "जुहुयादाज्यमन्वहम्" joined, where both sources print "जुहुयादाज्य मन्वहम्" (v16). Some traditions swap the half-lines "पिङ्गलां पद्ममालिनीम्" and "सुवर्णां हेममालिनीम्" between mantras 13 and 14 (with "चन्द्रां" and "सूर्यां"); both our sources have the order shown.
मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।
ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।