शिव तांडव स्तोत्रम्
Shiva Tandava Stotram
शिव तांडव स्तोत्रम् भगवान शिव के प्रचंड तांडव नृत्य का वर्णन करने वाला संस्कृत स्तोत्र है। परंपरा इसकी रचना लंकापति रावण की मानती है। इसमें १५ श्लोक और उनके बाद २ फलश्रुति श्लोक हैं, जिनकी तेज़ लय शिव के डमरू की थाप जैसी लगती है। परंपरा के अनुसार सोमवार और प्रदोष काल में इसका पाठ विशेष फलदायी है।
- 17 पद
- 7 मिनट
- लंकापति रावण द्वारा रचित माना जाता है
- उत्तम दिन: सोमवार
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थलेJatatavigalajjala Pravahapavitasthale
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।Gale'valambya Lambitam Bhujangatunga Malikam
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयंDamad Damad Damad Daman Ninadavad Damarvayam
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥Chakara Chanda Tandavam Tanotu Nah Shivah Shivam
जिनकी जटाओं के वन से बहती गंगा की धाराओं से पवित्र हुए कंठ पर लंबी सर्पमाला लटक रही है, और जिनका डमरू "डमड् डमड् डमड्" नाद कर रहा है, उन शिव ने प्रचंड तांडव किया। वे शिव हम सबका कल्याण करें।
- जटाटवीजटाओं का वन
- गलज्जलप्रवाहबहती जलधारा (गंगा)
- पावितस्थलेपवित्र हुए स्थान पर
- गलेगले में
- अवलम्ब्यलटकाकर
- लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्लंबी विशाल सर्पमाला
- डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवत्डमड् डमड् की ध्वनि करता
- डमर्वयम्यह डमरू
- चकार चण्डताण्डवंप्रचंड तांडव किया
- तनोतु नःहमारा विस्तार करें
- शिवः शिवम्शिव, कल्याण
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-Jatakatahasambhrama Bhramannilimpanirjhari
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।Vilolavichivallari Virajamanamurdhani
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावकेDhagad Dhagad Dhagajjvalal Lalata Patta Pavake
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥Kishora Chandrashekhare Ratih Pratikshanam Mama
जिनकी जटाओं के कड़ाह में वेग से घूमती देवनदी गंगा की चंचल लहरें मस्तक पर शोभित हैं, जिनके ललाट पर "धग्-धग्" करती अग्नि प्रज्वलित है, उन बालचंद्रधारी शिव में मेरी प्रीति हर क्षण बनी रहे।
- जटाकटाहजटाओं का कड़ाह
- सम्भ्रमभ्रमत्वेग से घूमती
- निलिम्पनिर्झरीदेवनदी गंगा
- विलोलवीचिवल्लरीचंचल लहरों की लताएँ
- विराजमानमूर्धनिजिनके मस्तक पर शोभित
- धगद्धगद्धगज्ज्वलत्धग्-धग् कर जलती
- ललाटपट्टपावकेललाट पर अग्नि वाले
- किशोरचन्द्रशेखरेबालचंद्र धारण करने वाले में
- रतिः प्रतिक्षणं मममेरी प्रीति हर क्षण
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-Dharadharendra Nandini Vilasa Bandhu Bandhura
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।Sphurad Diganta Santati Pramodamana Manase
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदिKripa Kataksha Dhorani Niruddha Durdharapadi
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥Kvachid Digambare Mano Vinodam Etu Vastuni
जो पर्वतराज-पुत्री पार्वती की लीलाओं से आनंदित हैं, जिनका मन दिशाओं के अंत तक फैली समस्त सृष्टि में प्रसन्न रहता है, जिनकी कृपा-दृष्टि की धारा कठिनतम विपत्तियों को रोक देती है, उन दिगंबर परम तत्त्व में मेरा मन आनंद पाए।
- धराधरेन्द्रनन्दिनीपर्वतराज की पुत्री पार्वती
- विलासबन्धुबन्धुरउनकी लीलाओं से आनंदित
- स्फुरद्दिगन्तसन्ततिदिशाओं के अंत तक फैले प्राणी
- प्रमोदमानमानसेजिनका मन प्रसन्न है
- कृपाकटाक्षधोरणीकृपा-कटाक्ष की धारा
- निरुद्धदुर्धरापदिकठिन विपत्तियों को रोकने वाली
- क्वचित्कभी
- दिगम्बरेदिगंबर (शिव) में
- मनो विनोदम् एतुमेरा मन आनंद पाए
- वस्तुनिउस परम तत्त्व में
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-Jata Bhujanga Pingala Sphurat Phana Mani Prabha
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।Kadamba Kunkuma Drava Pralipta Digvadhu Mukhe
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरेMadandha Sindhura Sphurat Tvag Uttariya Medure
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥Mano Vinodam Adbhutam Bibhartu Bhutabhartari
जिनकी जटाओं के सर्पों के फनों की मणियों की पीली आभा दिशा-रूपी वधुओं के मुख पर केसर के लेप-सी फैल रही है, जो मदमत्त हाथी की चमकती खाल को उत्तरीय बनाए हैं, उन भूतनाथ में मेरा मन अद्भुत आनंद पाए।
- जटाभुजङ्गजटाओं के सर्प
- पिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभाचमकते फनों की मणियों की पीली आभा
- कदम्बकुङ्कुमद्रवकेसर के लेप-सी
- प्रलिप्तदिग्वधूमुखेदिशा-रूपी वधुओं के मुख पर लिपी
- मदान्धसिन्धुरमदमत्त हाथी
- स्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरेउसकी चमकती खाल को उत्तरीय बनाए
- मनो विनोदम् अद्भुतं बिभर्तुमेरा मन अद्भुत आनंद धारण करे
- भूतभर्तरिप्राणियों के पालनकर्ता में
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-Sahasra Lochana Prabhrityashesha Lekha Shekhara
प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।Prasuna Dhuli Dhorani Vidhusaranghri Pithabhuh
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकःBhujangaraja Malaya Nibaddha Jatajutakah
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥Shriyai Chiraya Jayatam Chakora Bandhu Shekharah
इंद्र आदि सभी देवताओं के झुकते मुकुटों के फूलों से झरते पराग से जिनका चरण-पीठ धूसरित है, जिनका जटाजूट नागराज की माला से बँधा है, वे चंद्रशेखर शिव हमें चिरस्थायी समृद्धि दें।
- सहस्रलोचनप्रभृतिसहस्राक्ष इंद्र आदि
- अशेषलेखशेखरसभी देवताओं के मुकुट
- प्रसूनधूलिधोरणीपुष्पों के पराग की धारा
- विधूसराङ्घ्रिपीठभूःजिनका चरण-पीठ धूसरित है
- भुजङ्गराजमालयानागराज की माला से
- निबद्धजाटजूटकःजिनका जटाजूट बँधा है
- श्रियै चिराय जायतांचिरस्थायी समृद्धि के लिए हों
- चकोरबन्धुशेखरःचंद्रशेखर (चकोर के मित्र चंद्र को धारण करने वाले)
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-Lalata Chatvara Jvalad Dhananjaya Sphulingabha
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।Nipita Panchasayakam Naman Nilimpa Nayakam
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरंSudha Mayukha Lekhaya Virajamana Shekharam
महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः ॥Maha Kapali Sampade Shiro Jatalam Astu Nah
जिनके ललाट पर धधकती अग्नि की चिनगारियों ने पंचबाण कामदेव को भस्म कर दिया, देवराज इंद्र जिन्हें नमन करते हैं, जिनका शिखर अमृत-किरण चंद्रमा की रेखा से शोभित है, उन महाकपाली शिव का वह जटाधारी मस्तक हमें संपन्नता दे।
- ललाटचत्वरललाट का चौक
- ज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभाप्रज्वलित अग्नि की चिनगारियों की आभा
- निपीतपञ्चसायकंजिसने कामदेव को पी लिया
- नमन्निलिम्पनायकम्जिसे देवराज नमन करते हैं
- सुधामयूखलेखयाअमृत-किरण चंद्र की रेखा से
- विराजमानशेखरंशोभित शिखर वाला
- महाकपालिमहाकपाली (शिव) का
- सम्पदेसंपत्ति के लिए
- शिरो जटालम् अस्तु नःवह जटाधारी मस्तक हमारे लिए हो
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-Karala Bhala Pattika Dhagad Dhagad Dhagajjvalad
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।Dhananjayahuti Krita Prachanda Panchasayake
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-Dharadharendra Nandini Kuchagra Chitra Patraka
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥Prakalpanaika Shilpini Trilochane Ratir Mama
जिन्होंने अपने भयंकर ललाट पर "धग्-धग्" जलती अग्नि में प्रचंड कामदेव की आहुति दे दी, और जो पर्वतराज-पुत्री पार्वती के वक्ष पर प्रेम से चित्र-पत्रावली रचने वाले एकमात्र शिल्पी हैं, उन त्रिनेत्रधारी शिव में मेरी प्रीति है।
- करालभालपट्टिकाभयंकर ललाट-पट्ट
- धगद्धगद्धगज्ज्वलद्धनञ्जयधग्-धग् जलती अग्नि
- आहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायकेजिसमें प्रचंड कामदेव की आहुति दी
- धराधरेन्द्रनन्दिनीपर्वतराज-पुत्री पार्वती
- कुचाग्रचित्रपत्रकप्रकल्पनवक्ष पर चित्र-पत्रावली रचना
- एकशिल्पिनिएकमात्र शिल्पी
- त्रिलोचनेत्रिनेत्रधारी में
- रतिर्मममेरी प्रीति
नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्-Navina Megha Mandali Niruddha Durdhara Sphurat
कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः ।Kuhu Nishithini Tamah Prabandha Baddha Kandharah
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरःNilimpa Nirjharidharas Tanotu Kritti Sindhurah
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥Kalanidhana Bandhurah Shriyam Jagad Dhurandharah
जिनका कंठ नए घने मेघों से घिरी अमावस्या की आधी रात के अंधकार-सा श्याम है, जो देवगंगा को धारण करते हैं, गज-चर्म ओढ़ते हैं, चंद्रमा से सुशोभित हैं और जगत का भार उठाते हैं, वे शिव हमारी समृद्धि बढ़ाएँ।
- नवीनमेघमण्डलीनए मेघों का समूह
- निरुद्धदुर्धरस्फुरत्घिरा हुआ, घना
- कुहूनिशीथिनीतमःअमावस्या की आधी रात का अंधकार
- प्रबन्धबद्धकन्धरःजिनका कंठ उससे बँधा है
- निलिम्पनिर्झरीधरःदेवगंगा को धारण करने वाले
- तनोतुविस्तार करें
- कृत्तिसिन्धुरःगज-चर्म धारी
- कलानिधानबन्धुरःचंद्रमा से सुंदर
- श्रियंसमृद्धि
- जगद्धुरन्धरःजगत का भार उठाने वाले
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-Praphulla Nila Pankaja Prapancha Kalima Prabha
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।Valambi Kantha Kandali Ruchi Prabaddha Kandharam
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदंSmarachchhidam Purachchhidam Bhavachchhidam Makhachchhidam
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥Gajachchhidandhakachchhidam Tam Antakachchhidam Bhaje
जिनका कंठ खिले हुए नीलकमलों की श्याम कांति से सुशोभित है, उन कामदेव, त्रिपुर, संसार-बंधन और दक्ष-यज्ञ का विनाश करने वाले, गजासुर और अंधकासुर का संहार करने वाले, तथा स्वयं यमराज को भी जीतने वाले शिव को मैं भजता हूँ।
- प्रफुल्लनीलपङ्कजखिले नीलकमल
- प्रपञ्चकालिमप्रभावलम्बिउनकी फैली श्याम आभा लिए
- कण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्जिनका कंठ उस सुंदर श्याम कांति से बँधा है
- स्मरच्छिदंकामदेव का नाश करने वाले
- पुरच्छिदंत्रिपुर का नाश करने वाले
- भवच्छिदंसंसार-बंधन काटने वाले
- मखच्छिदंदक्ष-यज्ञ का विध्वंस करने वाले
- गजच्छिद्गजासुर-संहारक
- अन्धकच्छिदंअंधकासुर-संहारक
- तम् अन्तकच्छिदं भजेउन यमराज को भी जीतने वाले को भजता हूँ
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-Akharva Sarva Mangala Kala Kadamba Manjari
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् ।Rasa Pravaha Madhuri Vijrimbhana Madhuvratam
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकंSmarantakam Purantakam Bhavantakam Makhantakam
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥Gajantakandhakantakam Tam Antakantakam Bhaje
जो सर्वमंगला पार्वती की अपार कलाओं के पुष्प-गुच्छ से बहते मधुर रस में रमने वाले भ्रमर हैं, उन कामदेव, त्रिपुर, संसार-बंधन, दक्ष-यज्ञ, गजासुर और अंधकासुर का अंत करने वाले, और स्वयं यम के भी अंतक शिव को मैं भजता हूँ।
- अखर्वमहान, अपार
- सर्वमङ्गलासर्वमंगला पार्वती
- कलाकदम्बमञ्जरीकलाओं के पुष्प-गुच्छ
- रसप्रवाहमाधुरीबहते रस की मधुरता
- विजृम्भणामधुव्रतम्उसमें रमने वाला भ्रमर
- स्मरान्तकं पुरान्तकंकामदेव और त्रिपुर का अंत करने वाले
- भवान्तकं मखान्तकंसंसार और दक्ष-यज्ञ का अंत करने वाले
- गजान्तकान्धकान्तकंगजासुर और अंधक का अंत करने वाले
- तम् अन्तकान्तकं भजेउन यम के भी अंतक को भजता हूँ
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-Jayatvadabhra Vibhrama Bhramad Bhujangamashvasad
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।Vinirgamat Krama Sphurat Karala Bhala Havyavat
धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल-Dhimid Dhimid Dhimid Dhvanan Mridanga Tunga Mangala
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥Dhvani Krama Pravartita Prachanda Tandavah Shivah
उन शिव की जय हो! जिनके चारों ओर तीव्र वेग से घूमते सर्पों की फुफकार से ललाट की भयंकर अग्नि और भड़क उठती है, और जो "धिमिद्-धिमिद्-धिमिद्" बजते मृदंग की ऊँची मंगल लय पर प्रचंड तांडव कर रहे हैं।
- जयतुजय हो
- अदभ्रविभ्रमभ्रमत्तीव्र वेग से घूमते
- भुजङ्गमश्वसद्विनिर्गमत्सर्पों की निकलती फुफकार
- क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्ललाट की अग्नि क्रम से भड़कती
- धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनत्धिमिद्-धिमिद् की ध्वनि करता
- मृदङ्गतुङ्गमङ्गलध्वनिक्रममृदंग की ऊँची मंगल ध्वनि की लय
- प्रवर्तितप्रचण्डताण्डवःजिसके साथ प्रचंड तांडव करते
- शिवःशिव
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-Drishad Vichitra Talpayor Bhujanga Mauktika Srajor
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।Garishtha Ratna Loshthayoh Suhrid Vipaksha Pakshayoh
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोःTrinaravinda Chakshushoh Praja Mahi Mahendrayoh
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥Sama Pravrittikah Kada Sadashivam Bhajamyaham
पत्थर हो या सुंदर शय्या, सर्प हो या मोतियों की माला, बहुमूल्य रत्न हो या मिट्टी का ढेला, मित्र हो या शत्रु, तिनका हो या कमलनयनी सुंदरी, साधारण प्रजा हो या सम्राट, सबके प्रति समभाव रखते हुए मैं कब सदाशिव का भजन करूँगा?
- दृषद्विचित्रतल्पयोःपत्थर और सुंदर शय्या में
- भुजङ्गमौक्तिकस्रजोःसर्प और मोतियों की माला में
- गरिष्ठरत्नलोष्ठयोःबहुमूल्य रत्न और मिट्टी के ढेले में
- सुहृद्विपक्षपक्षयोःमित्र और शत्रु पक्ष में
- तृणारविन्दचक्षुषोःतिनके और कमलनयनी सुंदरी में
- प्रजामहीमहेन्द्रयोःसाधारण प्रजा और सम्राट में
- समप्रवृत्तिकःसमभाव रखता हुआ
- कदा सदाशिवं भजाम्यहम्कब मैं सदाशिव को भजूँगा?
कई रिकॉर्डिंग में अंतिम पंक्ति "समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे" गाई जाती है। हमने "समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्" पाठ दिया है। दोनों का अर्थ एक ही है: मन को सबके प्रति सम रखकर मैं कब सदाशिव को भजूँगा?
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्Kada Nilimpa Nirjhari Nikunja Kotare Vasan
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।Vimukta Durmatih Sada Shirahstham Anjalim Vahan
विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकःVilola Lola Lochano Lalama Bhala Lagnakah
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥Shiveti Mantram Uchcharan Kada Sukhi Bhavamyaham
कब मैं देवगंगा के तट के कुंजों की किसी गुफा में रहकर, दुर्बुद्धि से मुक्त होकर, सदा सिर पर अंजलि बाँधे, भाव से छलकते नेत्रों से चंद्र-सुशोभित ललाट वाले शिव में लीन होकर, "शिव" मंत्र का जाप करते हुए सुखी होऊँगा?
- कदाकब
- निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरेदेवगंगा के तट के कुंज की गुफा में
- वसन्रहते हुए
- विमुक्तदुर्मतिःदुर्बुद्धि से मुक्त
- सदा शिरःस्थम् अञ्जलिं वहन्सदा सिर पर अंजलि बाँधे
- विलोललोललोचनःभाव से चंचल नेत्रों वाला
- ललामभाललग्नकःसुशोभित ललाट वाले में लीन
- शिवेति मन्त्रम् उच्चरन्'शिव' मंत्र का उच्चारण करते
- कदा सुखी भवाम्यहम्कब मैं सुखी होऊँगा?
निलिम्पनाथनागरीकदम्बमौलमल्लिका-Nilimpa Natha Nagari Kadamba Maula Mallika
निगुम्फनिर्भरक्षरन्मधूष्णिकामनोहरः ।Nigumpha Nirbhara Ksharan Madhushnika Manoharah
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीमहर्निशंTanotu No Mano Mudam Vinodinim Aharnisham
परश्रियः परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः ॥Parashriyah Param Padam Tad Angaja Tvisham Chayah
इंद्रपुरी की अप्सराओं के केशों में गुँथी मल्लिका-मालाओं से झरते मधुर मकरंद से मनोहर बना, शिव के अंगों से निकलता कांति-पुंज, जो परम शोभा का परम धाम है, दिन-रात हमारे मन में आनंद भरे।
- निलिम्पनाथनागरीकदम्बइंद्रपुरी की अप्सराओं का समूह
- मौलमल्लिकानिगुम्फकेशों में गुँथी मल्लिका-मालाएँ
- निर्भरक्षरन्मधूष्णिकाभरपूर झरता मधुर मकरंद
- मनोहरःमनोहर
- तनोतु नो मनोमुदंहमारे मन का आनंद बढ़ाए
- विनोदिनीम् अहर्निशंआनंदमय, दिन-रात
- परश्रियः परं पदंपरम शोभा का परम धाम
- तदङ्गजत्विषां चयःउनके अंगों से निकली कांति का पुंज
श्लोक १४ और १५ प्रचलित संस्कृत संस्करण में हैं, पर कई लोकप्रिय रिकॉर्डिंग में छोड़ दिए जाते हैं।
प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारणीPrachanda Vadavanala Prabha Shubha Pracharani
महाष्टसिद्धिकामिनीजनाऽवहूतजल्पना ।Mahashta Siddhi Kamini Janavahuta Jalpana
विमुक्तवामलोचनाविवाहकालिकध्वनिःVimukta Vama Lochana Vivaha Kalika Dhvanih
शिवेति मन्त्रभूषणा जगज्जयाय जायताम् ॥Shiveti Mantra Bhushana Jagaj Jayaya Jayatam
शिव और सुंदर नयनों वाली पार्वती के विवाह के समय की वह ध्वनि प्रचंड वडवाग्नि की प्रभा-सी शुभ फैलाती है। आठ महासिद्धि-रूपी कामिनियों के आह्वान-वचन उसे गुँजाते हैं, और वह "शिव" मंत्र से विभूषित है। वह ध्वनि जगत की विजय के लिए हो।
- प्रचण्डवाडवानलप्रभाप्रचंड वडवाग्नि की प्रभा-सी
- शुभप्रचारणीशुभ फैलाने वाली
- महाष्टसिद्धिकामिनीजनआठ महासिद्धि-रूपी कामिनियाँ
- अवहूतजल्पनाजिनके आह्वान-वचनों से गूँजती
- विमुक्तवामलोचनासुंदर नयनों वाली (पार्वती)
- विवाहकालिकध्वनिःविवाह के समय की ध्वनि
- शिवेति मन्त्रभूषणा'शिव' मंत्र से विभूषित
- जगज्जयाय जायताम्जगत की विजय के लिए हो
यह सबसे कठिन श्लोक है; टीकाकार इसके लंबे समासों को अलग-अलग ढंग से तोड़ते हैं, और यहाँ दिया गया अर्थ एक पारंपरिक व्याख्या है।
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवंImam Hi Nityam Evam Uktam Uttamottamam Stavam
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम् ।Pathan Smaran Bruvan Naro Vishuddhim Eti Santatam
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिंHare Gurau Subhaktim Ashu Yati Nanyatha Gatim
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥Vimohanam Hi Dehinam Sushankarasya Chintanam
जो मनुष्य इस प्रकार कहे गए इस सर्वश्रेष्ठ स्तोत्र को नित्य पढ़ता, स्मरण करता या बोलता है, वह सदा पवित्र रहता है और शीघ्र ही गुरु-स्वरूप हर में उत्तम भक्ति पाता है; और कोई गति नहीं। परंपरा कहती है कि मंगलमय शंकर का चिंतन देहधारियों का मोह दूर करता है।
- इमं हिइस
- नित्यम्नित्य
- एवम् उक्तम्इस प्रकार कहे गए
- उत्तमोत्तमं स्तवंसर्वश्रेष्ठ स्तोत्र
- पठन्स्मरन्ब्रुवन्पढ़ता, स्मरण करता या बोलता
- नरःमनुष्य
- विशुद्धिम् एति सन्ततम्सदा शुद्धि पाता है
- हरे गुरौ सुभक्तिम्गुरु-स्वरूप हर में उत्तम भक्ति
- आशु यातिशीघ्र पाता है
- नान्यथा गतिंऔर कोई गति नहीं
- विमोहनं हि देहिनांदेहधारियों का मोह हरता है
- सुशङ्करस्य चिन्तनम्मंगलमय शंकर का चिंतन
श्लोक १६ और १७ फलश्रुति हैं, जो स्तोत्र-पाठ का फल बताते हैं।
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतंPujavasana Samaye Dashavaktra Gitam
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।Yah Shambhu Pujana Param Pathati Pradoshe
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तांTasya Sthiram Ratha Gajendra Turanga Yuktam
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥Lakshmim Sadaiva Sumukhim Pradadati Shambhuh
जो प्रदोष काल में पूजा के अंत में दशमुख रावण द्वारा गाए गए, शंभु-पूजा से युक्त इस स्तोत्र का पाठ करता है, परंपरा के अनुसार शंभु उसे रथ, श्रेष्ठ हाथी और घोड़ों से युक्त, सदा प्रसन्नमुखी, स्थिर लक्ष्मी प्रदान करते हैं।
- पूजावसानसमयेपूजा के अंत में
- दशवक्त्रगीतंदशमुख रावण द्वारा गाया
- यःजो
- शम्भुपूजनपरंशंभु की पूजा से युक्त
- पठति प्रदोषेप्रदोष में पढ़ता है
- तस्यउसे
- स्थिरांस्थिर
- रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तांरथ, श्रेष्ठ हाथी और घोड़ों से युक्त
- लक्ष्मींलक्ष्मी
- सदैव सुमुखींसदा प्रसन्नमुखी
- प्रददाति शम्भुःशंभु प्रदान करते हैं
पूर्ण
शिव तांडव स्तोत्रम् का पाठ पूर्ण हुआ।
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प्रश्न
शिव तांडव स्तोत्रम् किसने लिखा?
परंपरा के अनुसार लंकापति रावण ने, जो शिव के बड़े भक्त थे। प्रसिद्ध कथा है कि कैलास उठाने की कोशिश में जब वे पर्वत के नीचे दब गए, तब उन्होंने यह स्तोत्र गाया। दूसरा फलश्रुति श्लोक ख़ुद इसे "दशवक्त्र-गीत" यानी दस मुख वाले का गाया स्तोत्र कहता है।
शिव तांडव स्तोत्रम् में कितने श्लोक हैं?
प्रचलित संस्कृत संस्करण में कुल १७: १५ श्लोक और २ फलश्रुति। कई लोकप्रिय रिकॉर्डिंग श्लोक १४ और १५ छोड़कर १३ श्लोक और २ फलश्रुति गाती हैं, इसलिए कहीं-कहीं इसे १५ श्लोकों का बताया जाता है। दोनों रूप पारंपरिक हैं।
क्या शिव तांडव स्तोत्र रोज़ पढ़ सकते हैं?
हाँ। पहला फलश्रुति श्लोक ही इसके नित्य पाठ की प्रशंसा करता है, और स्तोत्र के लिए कोई दीक्षा ज़रूरी नहीं। शुरू में धीरे पढ़ें और शब्द साफ़ बोलें, गति अभ्यास से आ जाएगी।
शिव तांडव स्तोत्र पढ़ने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
प्रदोष काल, यानी शाम को शिव पूजा के अंत में। फलश्रुति में यही समय बताया गया है। सोमवार, मासिक प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि विशेष शुभ माने जाते हैं, और बहुत-से लोग सुबह स्नान के बाद भी इसका पाठ करते हैं।
शिव तांडव स्तोत्र डमरू जैसा क्यों लगता है?
इसके छंद की वजह से। पंचचामर छंद की हर पंक्ति में सोलह अक्षर होते हैं, लघु और गुरु बारी-बारी से, और कवि ने "डमड् डमड्" और "धिमिद् धिमिद्" जैसे ध्वनि-शब्द भी रखे हैं। इनसे ऐसी तेज़ लय बनती है जो शिव के डमरू और तांडव के मृदंग जैसी लगती है।
स्रोत और समीक्षा
स्रोत: Shiva Tandava Stotram (15 shlokas + 2 phalashruti) as attributed to Ravana; text collated from sanskritdocuments.org (shivtAND), sa.wikisource.org (शिवताण्डवस्तोत्रम्) and stotranidhi.com (Devanagari edition)
Majority readings followed: 4 मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वग् (wikisource: सिन्धुरासुरत्वग्); 5 श्रियै (wikisource: श्रिये); 6 महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः (wikisource: महः कपालि सम्पदे सरिज्जटालमस्तु नः); 13 विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः (wikisource: विमुक्तलोललोचनाललामभाललग्नकं); 17 लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं (wikisource: लक्ष्मीं प्रसादसमये). Shlokas 14 and 15 are absent from stotranidhi and from many popular recordings. Spelling मूर्धनि (some print मूर्द्धनि) and नान्यथा (some print नाऽन्यथा) are orthographic only. Meanings are Nitya's own.
मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।
ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।