शिव तांडव स्तोत्रम्

Shiva Tandava Stotram

शिव तांडव स्तोत्रम् भगवान शिव के प्रचंड तांडव नृत्य का वर्णन करने वाला संस्कृत स्तोत्र है। परंपरा इसकी रचना लंकापति रावण की मानती है। इसमें १५ श्लोक और उनके बाद २ फलश्रुति श्लोक हैं, जिनकी तेज़ लय शिव के डमरू की थाप जैसी लगती है। परंपरा के अनुसार सोमवार और प्रदोष काल में इसका पाठ विशेष फलदायी है।

  • 17 पद
  • 7 मिनट
  • लंकापति रावण द्वारा रचित माना जाता है
  • उत्तम दिन: सोमवार

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जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थलेJatatavigalajjala Pravahapavitasthale

गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।Gale'valambya Lambitam Bhujangatunga Malikam

डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयंDamad Damad Damad Daman Ninadavad Damarvayam

चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥Chakara Chanda Tandavam Tanotu Nah Shivah Shivam

जिनकी जटाओं के वन से बहती गंगा की धाराओं से पवित्र हुए कंठ पर लंबी सर्पमाला लटक रही है, और जिनका डमरू "डमड् डमड् डमड्" नाद कर रहा है, उन शिव ने प्रचंड तांडव किया। वे शिव हम सबका कल्याण करें।

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-Jatakatahasambhrama Bhramannilimpanirjhari

विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।Vilolavichivallari Virajamanamurdhani

धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावकेDhagad Dhagad Dhagajjvalal Lalata Patta Pavake

किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥Kishora Chandrashekhare Ratih Pratikshanam Mama

जिनकी जटाओं के कड़ाह में वेग से घूमती देवनदी गंगा की चंचल लहरें मस्तक पर शोभित हैं, जिनके ललाट पर "धग्-धग्" करती अग्नि प्रज्वलित है, उन बालचंद्रधारी शिव में मेरी प्रीति हर क्षण बनी रहे।

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-Dharadharendra Nandini Vilasa Bandhu Bandhura

स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।Sphurad Diganta Santati Pramodamana Manase

कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदिKripa Kataksha Dhorani Niruddha Durdharapadi

क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥Kvachid Digambare Mano Vinodam Etu Vastuni

जो पर्वतराज-पुत्री पार्वती की लीलाओं से आनंदित हैं, जिनका मन दिशाओं के अंत तक फैली समस्त सृष्टि में प्रसन्न रहता है, जिनकी कृपा-दृष्टि की धारा कठिनतम विपत्तियों को रोक देती है, उन दिगंबर परम तत्त्व में मेरा मन आनंद पाए।

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-Jata Bhujanga Pingala Sphurat Phana Mani Prabha

कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।Kadamba Kunkuma Drava Pralipta Digvadhu Mukhe

मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरेMadandha Sindhura Sphurat Tvag Uttariya Medure

मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥Mano Vinodam Adbhutam Bibhartu Bhutabhartari

जिनकी जटाओं के सर्पों के फनों की मणियों की पीली आभा दिशा-रूपी वधुओं के मुख पर केसर के लेप-सी फैल रही है, जो मदमत्त हाथी की चमकती खाल को उत्तरीय बनाए हैं, उन भूतनाथ में मेरा मन अद्भुत आनंद पाए।

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-Sahasra Lochana Prabhrityashesha Lekha Shekhara

प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।Prasuna Dhuli Dhorani Vidhusaranghri Pithabhuh

भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकःBhujangaraja Malaya Nibaddha Jatajutakah

श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥Shriyai Chiraya Jayatam Chakora Bandhu Shekharah

इंद्र आदि सभी देवताओं के झुकते मुकुटों के फूलों से झरते पराग से जिनका चरण-पीठ धूसरित है, जिनका जटाजूट नागराज की माला से बँधा है, वे चंद्रशेखर शिव हमें चिरस्थायी समृद्धि दें।

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-Lalata Chatvara Jvalad Dhananjaya Sphulingabha

निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।Nipita Panchasayakam Naman Nilimpa Nayakam

सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरंSudha Mayukha Lekhaya Virajamana Shekharam

महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः ॥Maha Kapali Sampade Shiro Jatalam Astu Nah

जिनके ललाट पर धधकती अग्नि की चिनगारियों ने पंचबाण कामदेव को भस्म कर दिया, देवराज इंद्र जिन्हें नमन करते हैं, जिनका शिखर अमृत-किरण चंद्रमा की रेखा से शोभित है, उन महाकपाली शिव का वह जटाधारी मस्तक हमें संपन्नता दे।

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-Karala Bhala Pattika Dhagad Dhagad Dhagajjvalad

द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।Dhananjayahuti Krita Prachanda Panchasayake

धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-Dharadharendra Nandini Kuchagra Chitra Patraka

प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥Prakalpanaika Shilpini Trilochane Ratir Mama

जिन्होंने अपने भयंकर ललाट पर "धग्-धग्" जलती अग्नि में प्रचंड कामदेव की आहुति दे दी, और जो पर्वतराज-पुत्री पार्वती के वक्ष पर प्रेम से चित्र-पत्रावली रचने वाले एकमात्र शिल्पी हैं, उन त्रिनेत्रधारी शिव में मेरी प्रीति है।

नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्-Navina Megha Mandali Niruddha Durdhara Sphurat

कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः ।Kuhu Nishithini Tamah Prabandha Baddha Kandharah

निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरःNilimpa Nirjharidharas Tanotu Kritti Sindhurah

कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥Kalanidhana Bandhurah Shriyam Jagad Dhurandharah

जिनका कंठ नए घने मेघों से घिरी अमावस्या की आधी रात के अंधकार-सा श्याम है, जो देवगंगा को धारण करते हैं, गज-चर्म ओढ़ते हैं, चंद्रमा से सुशोभित हैं और जगत का भार उठाते हैं, वे शिव हमारी समृद्धि बढ़ाएँ।

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-Praphulla Nila Pankaja Prapancha Kalima Prabha

वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।Valambi Kantha Kandali Ruchi Prabaddha Kandharam

स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदंSmarachchhidam Purachchhidam Bhavachchhidam Makhachchhidam

गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥Gajachchhidandhakachchhidam Tam Antakachchhidam Bhaje

जिनका कंठ खिले हुए नीलकमलों की श्याम कांति से सुशोभित है, उन कामदेव, त्रिपुर, संसार-बंधन और दक्ष-यज्ञ का विनाश करने वाले, गजासुर और अंधकासुर का संहार करने वाले, तथा स्वयं यमराज को भी जीतने वाले शिव को मैं भजता हूँ।

अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-Akharva Sarva Mangala Kala Kadamba Manjari

रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् ।Rasa Pravaha Madhuri Vijrimbhana Madhuvratam

स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकंSmarantakam Purantakam Bhavantakam Makhantakam

गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥Gajantakandhakantakam Tam Antakantakam Bhaje

जो सर्वमंगला पार्वती की अपार कलाओं के पुष्प-गुच्छ से बहते मधुर रस में रमने वाले भ्रमर हैं, उन कामदेव, त्रिपुर, संसार-बंधन, दक्ष-यज्ञ, गजासुर और अंधकासुर का अंत करने वाले, और स्वयं यम के भी अंतक शिव को मैं भजता हूँ।

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-Jayatvadabhra Vibhrama Bhramad Bhujangamashvasad

द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।Vinirgamat Krama Sphurat Karala Bhala Havyavat

धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल-Dhimid Dhimid Dhimid Dhvanan Mridanga Tunga Mangala

ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥Dhvani Krama Pravartita Prachanda Tandavah Shivah

उन शिव की जय हो! जिनके चारों ओर तीव्र वेग से घूमते सर्पों की फुफकार से ललाट की भयंकर अग्नि और भड़क उठती है, और जो "धिमिद्-धिमिद्-धिमिद्" बजते मृदंग की ऊँची मंगल लय पर प्रचंड तांडव कर रहे हैं।

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-Drishad Vichitra Talpayor Bhujanga Mauktika Srajor

गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।Garishtha Ratna Loshthayoh Suhrid Vipaksha Pakshayoh

तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोःTrinaravinda Chakshushoh Praja Mahi Mahendrayoh

समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥Sama Pravrittikah Kada Sadashivam Bhajamyaham

पत्थर हो या सुंदर शय्या, सर्प हो या मोतियों की माला, बहुमूल्य रत्न हो या मिट्टी का ढेला, मित्र हो या शत्रु, तिनका हो या कमलनयनी सुंदरी, साधारण प्रजा हो या सम्राट, सबके प्रति समभाव रखते हुए मैं कब सदाशिव का भजन करूँगा?

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्Kada Nilimpa Nirjhari Nikunja Kotare Vasan

विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।Vimukta Durmatih Sada Shirahstham Anjalim Vahan

विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकःVilola Lola Lochano Lalama Bhala Lagnakah

शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥Shiveti Mantram Uchcharan Kada Sukhi Bhavamyaham

कब मैं देवगंगा के तट के कुंजों की किसी गुफा में रहकर, दुर्बुद्धि से मुक्त होकर, सदा सिर पर अंजलि बाँधे, भाव से छलकते नेत्रों से चंद्र-सुशोभित ललाट वाले शिव में लीन होकर, "शिव" मंत्र का जाप करते हुए सुखी होऊँगा?

निलिम्पनाथनागरीकदम्बमौलमल्लिका-Nilimpa Natha Nagari Kadamba Maula Mallika

निगुम्फनिर्भरक्षरन्मधूष्णिकामनोहरः ।Nigumpha Nirbhara Ksharan Madhushnika Manoharah

तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीमहर्निशंTanotu No Mano Mudam Vinodinim Aharnisham

परश्रियः परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः ॥Parashriyah Param Padam Tad Angaja Tvisham Chayah

इंद्रपुरी की अप्सराओं के केशों में गुँथी मल्लिका-मालाओं से झरते मधुर मकरंद से मनोहर बना, शिव के अंगों से निकलता कांति-पुंज, जो परम शोभा का परम धाम है, दिन-रात हमारे मन में आनंद भरे।

प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारणीPrachanda Vadavanala Prabha Shubha Pracharani

महाष्टसिद्धिकामिनीजनाऽवहूतजल्पना ।Mahashta Siddhi Kamini Janavahuta Jalpana

विमुक्तवामलोचनाविवाहकालिकध्वनिःVimukta Vama Lochana Vivaha Kalika Dhvanih

शिवेति मन्त्रभूषणा जगज्जयाय जायताम् ॥Shiveti Mantra Bhushana Jagaj Jayaya Jayatam

शिव और सुंदर नयनों वाली पार्वती के विवाह के समय की वह ध्वनि प्रचंड वडवाग्नि की प्रभा-सी शुभ फैलाती है। आठ महासिद्धि-रूपी कामिनियों के आह्वान-वचन उसे गुँजाते हैं, और वह "शिव" मंत्र से विभूषित है। वह ध्वनि जगत की विजय के लिए हो।

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवंImam Hi Nityam Evam Uktam Uttamottamam Stavam

पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम् ।Pathan Smaran Bruvan Naro Vishuddhim Eti Santatam

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिंHare Gurau Subhaktim Ashu Yati Nanyatha Gatim

विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥Vimohanam Hi Dehinam Sushankarasya Chintanam

जो मनुष्य इस प्रकार कहे गए इस सर्वश्रेष्ठ स्तोत्र को नित्य पढ़ता, स्मरण करता या बोलता है, वह सदा पवित्र रहता है और शीघ्र ही गुरु-स्वरूप हर में उत्तम भक्ति पाता है; और कोई गति नहीं। परंपरा कहती है कि मंगलमय शंकर का चिंतन देहधारियों का मोह दूर करता है।

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतंPujavasana Samaye Dashavaktra Gitam

यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।Yah Shambhu Pujana Param Pathati Pradoshe

तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तांTasya Sthiram Ratha Gajendra Turanga Yuktam

लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥Lakshmim Sadaiva Sumukhim Pradadati Shambhuh

जो प्रदोष काल में पूजा के अंत में दशमुख रावण द्वारा गाए गए, शंभु-पूजा से युक्त इस स्तोत्र का पाठ करता है, परंपरा के अनुसार शंभु उसे रथ, श्रेष्ठ हाथी और घोड़ों से युक्त, सदा प्रसन्नमुखी, स्थिर लक्ष्मी प्रदान करते हैं।

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प्रश्न

शिव तांडव स्तोत्रम् किसने लिखा?

परंपरा के अनुसार लंकापति रावण ने, जो शिव के बड़े भक्त थे। प्रसिद्ध कथा है कि कैलास उठाने की कोशिश में जब वे पर्वत के नीचे दब गए, तब उन्होंने यह स्तोत्र गाया। दूसरा फलश्रुति श्लोक ख़ुद इसे "दशवक्त्र-गीत" यानी दस मुख वाले का गाया स्तोत्र कहता है।

शिव तांडव स्तोत्रम् में कितने श्लोक हैं?

प्रचलित संस्कृत संस्करण में कुल १७: १५ श्लोक और २ फलश्रुति। कई लोकप्रिय रिकॉर्डिंग श्लोक १४ और १५ छोड़कर १३ श्लोक और २ फलश्रुति गाती हैं, इसलिए कहीं-कहीं इसे १५ श्लोकों का बताया जाता है। दोनों रूप पारंपरिक हैं।

क्या शिव तांडव स्तोत्र रोज़ पढ़ सकते हैं?

हाँ। पहला फलश्रुति श्लोक ही इसके नित्य पाठ की प्रशंसा करता है, और स्तोत्र के लिए कोई दीक्षा ज़रूरी नहीं। शुरू में धीरे पढ़ें और शब्द साफ़ बोलें, गति अभ्यास से आ जाएगी।

शिव तांडव स्तोत्र पढ़ने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?

प्रदोष काल, यानी शाम को शिव पूजा के अंत में। फलश्रुति में यही समय बताया गया है। सोमवार, मासिक प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि विशेष शुभ माने जाते हैं, और बहुत-से लोग सुबह स्नान के बाद भी इसका पाठ करते हैं।

शिव तांडव स्तोत्र डमरू जैसा क्यों लगता है?

इसके छंद की वजह से। पंचचामर छंद की हर पंक्ति में सोलह अक्षर होते हैं, लघु और गुरु बारी-बारी से, और कवि ने "डमड् डमड्" और "धिमिद् धिमिद्" जैसे ध्वनि-शब्द भी रखे हैं। इनसे ऐसी तेज़ लय बनती है जो शिव के डमरू और तांडव के मृदंग जैसी लगती है।

स्रोत और समीक्षा

स्रोत: Shiva Tandava Stotram (15 shlokas + 2 phalashruti) as attributed to Ravana; text collated from sanskritdocuments.org (shivtAND), sa.wikisource.org (शिवताण्डवस्तोत्रम्) and stotranidhi.com (Devanagari edition)

Majority readings followed: 4 मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वग् (wikisource: सिन्धुरासुरत्वग्); 5 श्रियै (wikisource: श्रिये); 6 महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः (wikisource: महः कपालि सम्पदे सरिज्जटालमस्तु नः); 13 विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः (wikisource: विमुक्तलोललोचनाललामभाललग्नकं); 17 लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं (wikisource: लक्ष्मीं प्रसादसमये). Shlokas 14 and 15 are absent from stotranidhi and from many popular recordings. Spelling मूर्धनि (some print मूर्द्धनि) and नान्यथा (some print नाऽन्यथा) are orthographic only. Meanings are Nitya's own.

मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।

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