श्री वेंकटेश सुप्रभातम्
Sri Venkatesa Suprabhatam
श्री वेंकटेश सुप्रभातम् वह प्रभात-स्तोत्र है जिससे रोज़ सुबह तिरुमला में भगवान वेंकटेश्वर को जगाया जाता है, और परंपरा से इसे सूर्योदय से पहले गाया या सुना जाता है। इसके २९ संस्कृत श्लोक १५वीं शताब्दी में प्रतिवादि भयंकरम् अण्णन् ने रचे, और इसकी शुरुआत रामायण में बालक राम से कहे गए विश्वामित्र के वचन "कौसल्या सुप्रजा राम" से होती है। इस पृष्ठ पर ये २९ श्लोक हैं; प्रातःपाठ में इनके बाद आने वाले स्तोत्रम्, प्रपत्ति और मंगलाशासनम् अभी यहाँ नहीं हैं।
- 29 पद
- 12 मिनट
- प्रतिवादि भयंकरम् अण्णंगराचार्य (अण्णन्), १५वीं शताब्दी
- उत्तम दिन: शनिवार
कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते ।Kausalya Supraja Rama Purva Sandhya Pravartate
उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमाह्निकम् ॥Uttishtha Narashardula Kartavyam Daivamahnikam
हे राम, कौसल्या के सुपुत्र! पूर्व दिशा में प्रभात की संध्या हो रही है। हे नरश्रेष्ठ, उठिए; दिन के पवित्र नित्यकर्म आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
- कौसल्याकौसल्या (राम की माता)
- सुप्रजाउत्तम पुत्र वाली
- रामहे राम
- पूर्वापूर्व दिशा की
- सन्ध्याप्रातः संध्या
- प्रवर्ततेआरंभ हो रही है
- उत्तिष्ठउठिए
- नरशार्दूलहे नरश्रेष्ठ
- कर्तव्यंकरने योग्य है
- दैवम्दैवी
- आह्निकम्दैनिक नित्यकर्म
यह श्लोक वाल्मीकि रामायण (बालकांड २३.२) से है, जहाँ विश्वामित्र यात्रा में बालक राम-लक्ष्मण को जगाते हैं।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज ।Uttishthottishtha Govinda Uttishtha Garudadhvaja
उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यं मङ्गलं कुरु ॥Uttishtha Kamalakanta Trailokyam Mangalam Kuru
उठिए, उठिए, हे गोविंद! उठिए, हे गरुड़ध्वज! उठिए, हे लक्ष्मीकांत, और तीनों लोकों का मंगल कीजिए।
- उत्तिष्ठोत्तिष्ठउठिए, उठिए
- गोविन्दहे गोविंद
- गरुडध्वजहे गरुड़ध्वज
- कमलाकान्तहे लक्ष्मीकांत
- त्रैलोक्यंतीनों लोकों को
- मङ्गलंमंगल
- कुरुकीजिए
मातस्समस्तजगतां मधुकैटभारेःMatas Samasta Jagatam Madhukaitabhareh
वक्षोविहारिणि मनोहरदिव्यमूर्ते ।Vakshoviharini Manohara Divyamurte
श्रीस्वामिनि श्रितजनप्रियदानशीलेSri Swamini Shritajana Priya Danashile
श्रीवेङ्कटेशदयिते तव सुप्रभातम् ॥Sri Venkatesha Dayite Tava Suprabhatam
हे समस्त जगत की माता, मधु-कैटभ के संहारक विष्णु के वक्षस्थल पर विहार करने वाली, मनोहर दिव्य रूप वाली! हे स्वामिनी, शरणागतों को उनकी प्रिय वस्तु देने वाली, हे श्री वेंकटेश की प्रिया, आपका प्रभात मंगलमय हो।
- मातःहे माता
- समस्तजगताम्समस्त जगत की
- मधुकैटभारेःमधु-कैटभ के शत्रु (विष्णु) के
- वक्षोविहारिणिवक्षस्थल पर विहार करने वाली
- मनोहरदिव्यमूर्तेहे मनोहर दिव्य मूर्ति
- श्रीस्वामिनिहे स्वामिनी
- श्रितजनप्रियदानशीलेशरणागतों को प्रिय वस्तु देने वाली
- श्रीवेङ्कटेशदयितेहे श्री वेंकटेश की प्रिया
- तवआपका
- सुप्रभातम्सुप्रभात
श्लोक ३ और ४ देवी लक्ष्मी (अलमेलु मंगा / पद्मावती) को संबोधित हैं; श्रीवैष्णव परंपरा में पहले माता को जगाया जाता है।
तव सुप्रभातमरविन्दलोचनेTava Suprabhatam Aravinda Lochane
भवतु प्रसन्नमुखचन्द्रमण्डले ।Bhavatu Prasanna Mukha Chandra Mandale
विधिशङ्करेन्द्रवनिताभिरर्चितेVidhi Shankarendra Vanitabhir Archite
वृषशैलनाथदयिते दयानिधे ॥Vrishashaila Natha Dayite Dayanidhe
हे कमलनयनी, जिनका प्रसन्न मुख पूर्ण चंद्र-सा है; ब्रह्मा, शंकर और इंद्र की पत्नियाँ जिनकी पूजा करती हैं; हे वृषशैलनाथ की प्रिया, हे दयानिधि, आपका प्रभात मंगलमय हो।
- तव सुप्रभातम्आपका सुप्रभात
- अरविन्दलोचनेहे कमलनयनी
- भवतुहो
- प्रसन्नमुखचन्द्रमण्डलेजिनका प्रसन्न मुख चंद्रमंडल-सा है
- विधिशङ्करेन्द्रवनिताभिःब्रह्मा, शंकर और इंद्र की पत्नियों द्वारा
- अर्चितेहे पूजिता
- वृषशैलनाथदयितेहे वृषशैल (तिरुमला) के स्वामी की प्रिया
- दयानिधेहे दया की निधि
अत्र्यादिसप्तऋषयस्समुपास्य सन्ध्यांAtryadi Saptarishayas Samupasya Sandhyam
आकाशसिन्धुकमलानि मनोहराणि ।Akasha Sindhu Kamalani Manoharani
आदाय पादयुगमर्चयितुं प्रपन्नाःAdaya Padayugam Archayitum Prapannah
शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम् ॥Sheshadri Shekhara Vibho Tava Suprabhatam
अत्रि आदि सप्तर्षि संध्या-उपासना करके, आकाशगंगा के मनोहर कमल लेकर आपके चरण-युगल की पूजा के लिए आए हैं। हे शेषाद्रि-शिखर के स्वामी, आपका सुप्रभात हो।
- अत्र्यादिसप्तऋषयःअत्रि आदि सप्तर्षि
- समुपास्य सन्ध्यांसंध्या-उपासना करके
- आकाशसिन्धुकमलानिआकाशगंगा के कमल
- मनोहराणिमनोहर
- आदायलेकर
- पादयुगम्चरण-युगल
- अर्चयितुंपूजने के लिए
- प्रपन्नाःआए हैं
- शेषाद्रिशेखरविभोहे शेषाद्रि-शिखर के स्वामी
पञ्चाननाब्जभवषण्मुखवासवाद्याःPanchananabja Bhava Shanmukha Vasavadyah
त्रैविक्रमादिचरितं विबुधाः स्तुवन्ति ।Traivikramadi Charitam Vibudhah Stuvanti
भाषापतिः पठति वासरशुद्धिमारात्Bhashapatih Pathati Vasara Shuddhim Arat
शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम् ॥Sheshadri Shekhara Vibho Tava Suprabhatam
पंचमुख शिव, कमलजन्मा ब्रह्मा, षडानन कार्तिकेय, इंद्र आदि देवता आपके त्रिविक्रम आदि चरित्रों की स्तुति कर रहे हैं। वाणी के स्वामी बृहस्पति समीप खड़े होकर आज के दिन का पंचांग पढ़ रहे हैं। हे शेषाद्रि-शिखर के स्वामी, आपका सुप्रभात हो।
- पञ्चाननपंचमुख शिव
- अब्जभवकमल से जन्मे ब्रह्मा
- षण्मुखषडानन कार्तिकेय
- वासवाद्याःइंद्र आदि
- त्रैविक्रमादिचरितंत्रिविक्रम आदि लीलाएँ
- विबुधाःदेवगण
- स्तुवन्तिस्तुति करते हैं
- भाषापतिःवाणी के स्वामी बृहस्पति
- पठतिपढ़ते हैं
- वासरशुद्धिम्दिन का पंचांग-शुद्धि
- आरात्समीप खड़े होकर
ईषत्प्रफुल्लसरसीरुहनारिकेल-Ishat Praphulla Sarasiruha Narikela
पूगद्रुमादिसुमनोहरपालिकानाम् ।Puga Drumadi Sumanohara Palikanam
आवाति मन्दमनिलस्सह दिव्यगन्धैःAvati Mandam Anilas Saha Divya Gandhaih
शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम् ॥Sheshadri Shekhara Vibho Tava Suprabhatam
थोड़े-थोड़े खिले कमलों और नारियल, सुपारी आदि वृक्षों की सुंदर पंक्तियों की दिव्य सुगंध लेकर मंद पवन बह रहा है। हे शेषाद्रि-शिखर के स्वामी, आपका सुप्रभात हो।
- ईषत्प्रफुल्लथोड़े-थोड़े खिले
- सरसीरुहकमल
- नारिकेलनारियल
- पूगद्रुमादिसुपारी आदि वृक्ष
- सुमनोहरपालिकानाम्सुंदर पंक्तियों की
- आवातिबह रही है
- मन्दम्मंद-मंद
- अनिलःपवन
- सह दिव्यगन्धैःदिव्य सुगंधों के साथ
उन्मील्य नेत्रयुगमुत्तमपञ्जरस्थाःUnmilya Netrayugam Uttama Panjarasthah
पात्रावशिष्टकदलीफलपायसानि ।Patravashishta Kadali Phala Payasani
भुक्त्वा सलीलमथ केलिशुकाः पठन्तिBhuktva Salilam Atha Kelishukah Pathanti
शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम् ॥Sheshadri Shekhara Vibho Tava Suprabhatam
सुंदर पिंजरों में बैठे पालतू तोते आँखें खोलकर, अपने पात्रों में बचे केले और खीर खेल-खेल में खाकर, अब (आपका नाम) पढ़ने लगे हैं। हे शेषाद्रि-शिखर के स्वामी, आपका सुप्रभात हो।
- उन्मील्यखोलकर
- नेत्रयुगम्दोनों आँखें
- उत्तमपञ्जरस्थाःसुंदर पिंजरों में बैठे
- पात्रावशिष्टपात्रों में बचे
- कदलीफलपायसानिकेले और खीर
- भुक्त्वाखाकर
- सलीलम्क्रीड़ापूर्वक
- अथफिर
- केलिशुकाःपालतू तोते
- पठन्तिपाठ करते हैं
तन्त्रीप्रकर्षमधुरस्वनया विपञ्च्याTantri Prakarsha Madhura Svanaya Vipanchya
गायत्यनन्तचरितं तव नारदोऽपि ।Gayatyananta Charitam Tava Naradopi
भाषासमग्रमसकृत्करचाररम्यंBhasha Samagram Asakrit Karachara Ramyam
शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम् ॥Sheshadri Shekhara Vibho Tava Suprabhatam
नारद मुनि भी तारों की झंकार से मधुर स्वर देने वाली अपनी वीणा पर, हाथ की सुंदर गति के साथ, पूर्ण और मधुर शब्दों में बार-बार आपके अनंत चरित्र का गान कर रहे हैं। हे शेषाद्रि-शिखर के स्वामी, आपका सुप्रभात हो।
- तन्त्रीप्रकर्षमधुरस्वनयातारों के झंकार से मधुर स्वर वाली
- विपञ्च्यावीणा से
- गायतिगाते हैं
- अनन्तचरितंअनंत चरित्र
- नारदः अपिनारद भी
- भाषासमग्रम्पूर्ण भाषा में
- असकृत्बार-बार
- करचाररम्यंहाथ की गति से रमणीय
भृङ्गावली च मकरन्दरसानुविद्ध-Bhringavali Cha Makaranda Rasanuviddha
झङ्कारगीतनिनदैः सह सेवनाय ।Jhankara Gita Ninadaih Saha Sevanaya
निर्यात्युपान्तसरसीकमलोदरेभ्यःNiryatyupanta Sarasi Kamalodarebhyah
शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम् ॥Sheshadri Shekhara Vibho Tava Suprabhatam
मकरंद-रस में डूबी भौंरों की पंक्तियाँ गुंजार-गीत गाती हुई, आपकी सेवा के लिए पास के सरोवरों के कमलों के भीतर से निकल रही हैं। हे शेषाद्रि-शिखर के स्वामी, आपका सुप्रभात हो।
- भृङ्गावलीभौंरों की पंक्ति
- मकरन्दरसानुविद्धमकरंद-रस में डूबी
- झङ्कारगीतनिनदैः सहगुंजार-गीत के साथ
- सेवनायसेवा के लिए
- निर्यातिनिकल रही है
- उपान्तसरसीकमलोदरेभ्यःपास के सरोवरों के कमलों के भीतर से
योषागणेन वरदध्नि विमथ्यमानेYoshaganena Varadadhni Vimathyamane
घोषालयेषु दधिमन्थनतीव्रघोषाः ।Ghoshalayeshu Dadhimanthana Tivra Ghoshah
रोषात्कलिं विदधते ककुभश्च कुम्भाःRoshat Kalim Vidadhate Kakubhashcha Kumbhah
शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम् ॥Sheshadri Shekhara Vibho Tava Suprabhatam
ग्वालों के घरों में स्त्रियाँ उत्तम दही मथ रही हैं; मथानी की तीव्र ध्वनि से घड़े और गूँजती दिशाएँ मानो आपस में होड़ करते हुए कलह कर रहे हैं। हे शेषाद्रि-शिखर के स्वामी, आपका सुप्रभात हो।
- योषागणेनस्त्रियों के समूह द्वारा
- वरदध्निउत्तम दही
- विमथ्यमानेमथे जाते समय
- घोषालयेषुग्वालों के घरों में
- दधिमन्थनतीव्रघोषाःदही मथने के तीव्र स्वर वाले
- रोषात्मानो क्रोध से
- कलिं विदधतेकलह करते हैं
- ककुभःदिशाएँ
- च कुम्भाःऔर घड़े
पद्मेशमित्रशतपत्रगतालिवर्गाःPadmesha Mitra Shatapatra Gatalivargah
हर्तुं श्रियं कुवलयस्य निजाङ्गलक्ष्म्या ।Hartum Shriyam Kuvalayasya Nijanga Lakshmya
भेरीनिनादमिव बिभ्रति तीव्रनादंBheri Ninadam Iva Bibhrati Tivra Nadam
शेषाद्रिशेखरविभो तव सुप्रभातम् ॥Sheshadri Shekhara Vibho Tava Suprabhatam
सूर्य के मित्र कमलों में बैठे भ्रमर-समूह, मानो अपने अंगों की श्याम कांति से नीलकमल की शोभा छीनने निकले हों, नगाड़ों जैसा तीव्र गुंजार कर रहे हैं। हे शेषाद्रि-शिखर के स्वामी, आपका सुप्रभात हो।
- पद्मेशमित्रसूर्य के मित्र
- शतपत्रगतकमल में स्थित
- अलिवर्गाःभ्रमर-समूह
- हर्तुं श्रियंशोभा हरने के लिए
- कुवलयस्यनीलकमल की
- निजाङ्गलक्ष्म्याअपने अंगों की कांति से
- भेरीनिनादम् इवनगाड़ों के नाद की तरह
- बिभ्रतिधारण करते हैं
- तीव्रनादंतीव्र गुंजार
श्रीमन्नभीष्टवरदाखिललोकबन्धोSriman Abhishta Varadakhila Loka Bandho
श्रीश्रीनिवास जगदेकदयैकसिन्धो ।Sri Srinivasa Jagadeka Dayaika Sindho
श्रीदेवतागृहभुजान्तरदिव्यमूर्तेSri Devata Griha Bhujantara Divya Murte
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥Sri Venkatachalapate Tava Suprabhatam
हे श्रीमान, मनोवांछित वर देने वाले, समस्त लोकों के बंधु! हे श्रीनिवास, जगत के एकमात्र दया-सागर! हे दिव्यमूर्ति, जिनका वक्षस्थल लक्ष्मीजी का निवास है! हे श्री वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।
- श्रीमन्हे श्रीमान
- अभीष्टवरदमनोवांछित वर देने वाले
- अखिललोकबन्धोहे समस्त लोकों के बंधु
- श्रीश्रीनिवासहे श्रीनिवास
- जगदेकदयैकसिन्धोहे जगत के एकमात्र दया-सागर
- श्रीदेवतागृहभुजान्तरजिनका वक्ष लक्ष्मी का निवास है
- दिव्यमूर्तेहे दिव्यमूर्ति
- श्रीवेङ्कटाचलपतेहे श्री वेंकटाचलपति
श्रीस्वामिपुष्करिणिकाप्लवनिर्मलाङ्गाःSri Swami Pushkarinika Plava Nirmalangah
श्रेयोऽर्थिनो हरविरिञ्चिसनन्दनाद्याः ।Shreyorthino Hara Viranchi Sanandanadyah
द्वारे वसन्ति वरवेत्रहतोत्तमाङ्गाःDvare Vasanti Vara Vetra Hatottamangah
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥Sri Venkatachalapate Tava Suprabhatam
कल्याण के इच्छुक शिव, ब्रह्मा, सनंदन आदि, स्वामी पुष्करिणी में स्नान कर निर्मल होकर आपके द्वार पर प्रतीक्षा कर रहे हैं, और भीड़ सँभालते द्वारपालों की छड़ियाँ उनके सिरों को छू रही हैं। हे श्री वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।
- श्रीस्वामिपुष्करिणिकास्वामी पुष्करिणी सरोवर
- आप्लवनिर्मलाङ्गाःस्नान से निर्मल शरीर वाले
- श्रेयोऽर्थिनःकल्याण के इच्छुक
- हरविरिञ्चिसनन्दनाद्याःशिव, ब्रह्मा, सनंदन आदि
- द्वारे वसन्तिद्वार पर खड़े हैं
- वरवेत्रहतोत्तमाङ्गाःद्वारपालों की छड़ी से सिर पर ताड़ित
श्रीशेषशैलगरुडाचलवेङ्कटाद्रि-Sri Shesha Shaila Garudachala Venkatadri
नारायणाद्रिवृषभाद्रिवृषाद्रिमुख्याम् ।Narayanadri Vrishabhadri Vrishadri Mukhyam
आख्यां त्वदीयवसतेरनिशं वदन्तिAkhyam Tvadiya Vasater Anisham Vadanti
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥Sri Venkatachalapate Tava Suprabhatam
भक्तजन आपके निवास-पर्वत के पवित्र नाम, जैसे शेषशैल, गरुडाचल, वेंकटाद्रि, नारायणाद्रि, वृषभाद्रि, वृषाद्रि आदि, निरंतर जपते रहते हैं। हे श्री वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।
- श्रीशेषशैलशेषशैल
- गरुडाचलगरुडाचल
- वेङ्कटाद्रिवेंकटाद्रि
- नारायणाद्रिनारायणाद्रि
- वृषभाद्रिवृषभाद्रि
- वृषाद्रिमुख्याम्वृषाद्रि आदि
- आख्यांनामों को
- त्वदीयवसतेःआपके निवास के
- अनिशं वदन्तिनिरंतर कहते हैं
ये तिरुमला की सात पहाड़ियों के पारंपरिक नामों में से छह हैं; सातवीं, अंजनाद्रि, का नाम इस श्लोक में नहीं है।
सेवापराः शिवसुरेशकृशानुधर्म-Sevaparah Shiva Suresha Krishanu Dharma
रक्षोऽम्बुनाथपवमानधनाधिनाथाः ।Rakshombunatha Pavamana Dhanadhinathah
बद्धाञ्जलिप्रविलसन्निजशीर्षदेशाःBaddhanjali Pravilasan Nija Shirsha Deshah
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥Sri Venkatachalapate Tava Suprabhatam
आपकी सेवा में तत्पर आठों दिक्पाल (शिव, इंद्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु और कुबेर) अपने सिरों पर अंजलि बाँधे खड़े हैं। हे श्री वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।
- सेवापराःसेवा में तत्पर
- शिवशिव (ईशान)
- सुरेशदेवराज इंद्र
- कृशानुअग्नि
- धर्मयम (धर्मराज)
- रक्षःनिर्ऋति (राक्षसों के स्वामी)
- अम्बुनाथवरुण
- पवमानवायु
- धनाधिनाथाःधनपति कुबेर
- बद्धाञ्जलिजुड़ी हुई अंजलि
- प्रविलसन्निजशीर्षदेशाःअपने सिर पर शोभित
धाटीषु ते विहगराजमृगाधिराज-Dhatishu Te Vihagaraja Mrigadhiraja
नागाधिराजगजराजहयाधिराजाः ।Nagadhiraja Gajaraja Hayadhirajah
स्वस्वाधिकारमहिमाधिकमर्थयन्तेSvasvadhikara Mahimadhikam Arthayante
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥Sri Venkatachalapate Tava Suprabhatam
आपकी शोभायात्राओं में आपको वहन करने वाले पक्षिराज गरुड़, मृगराज सिंह, नागराज शेष, गजराज और अश्वराज, सब अपने-अपने सेवा-अधिकार की महिमा और बढ़ने की प्रार्थना कर रहे हैं। हे श्री वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।
- धाटीषु तेआपकी शोभायात्राओं में
- विहगराजपक्षिराज गरुड़
- मृगाधिराजमृगराज सिंह
- नागाधिराजनागराज शेष
- गजराजगजराज
- हयाधिराजाःअश्वराज
- स्वस्वाधिकारमहिमाधिकम्अपने-अपने अधिकार की अधिक महिमा
- अर्थयन्तेमाँगते हैं
ये वे वाहन हैं जिन पर तिरुमला ब्रह्मोत्सव में प्रभु की सवारी निकलती है।
सूर्येन्दुभौमबुधवाक्पतिकाव्यसौरि-Suryendu Bhauma Budha Vakpati Kavya Sauri
स्वर्भानुकेतुदिविषत्परिषत्प्रधानाः ।Svarbhanu Ketu Divishat Parishat Pradhanah
त्वद्दासदासचरमावधिदासदासाःTvaddasa Dasa Charamavadhi Dasa Dasah
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥Sri Venkatachalapate Tava Suprabhatam
सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु, जो देवसभा के प्रमुख हैं, स्वयं को आपके दासों के दासों की परंपरा में सबसे अंतिम के भी दास मानते हैं। हे श्री वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।
- सूर्यसूर्य
- इन्दुचंद्रमा
- भौममंगल
- बुधबुध
- वाक्पतिबृहस्पति
- काव्यशुक्र
- सौरिशनि
- स्वर्भानुराहु
- केतुकेतु
- दिविषत्परिषत्प्रधानाःदेवसभा के प्रमुख
- त्वद्दासदासचरमावधिदासदासाःआपके दासों के दासों की अंतिम कड़ी के भी दास
त्वत्पादधूलिभरितस्फुरितोत्तमाङ्गाःTvat Pada Dhuli Bharita Sphuritottamangah
स्वर्गापवर्गनिरपेक्षनिजान्तरङ्गाः ।Svargapavarga Nirapeksha Nijantarangah
कल्पागमाकलनयाकुलतां लभन्तेKalpagamakalanayakulatam Labhante
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥Sri Venkatachalapate Tava Suprabhatam
जिनके मस्तक आपकी चरण-धूलि से दीप्त हैं और जिनका मन स्वर्ग या मोक्ष की भी अपेक्षा नहीं रखता, ऐसे भक्त केवल इस विचार से व्याकुल होते हैं कि कहीं कल्प का अंत आकर यह सेवा न छीन ले। हे श्री वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।
- त्वत्पादधूलिभरितआपकी चरण-धूलि से भरे
- स्फुरितोत्तमाङ्गाःदीप्त मस्तक वाले
- स्वर्गापवर्गनिरपेक्षस्वर्ग और मोक्ष की भी अपेक्षा न रखने वाले
- निजान्तरङ्गाःअंतर्मन वाले
- कल्पागमकल्प के आगमन
- आकलनयाके विचार से
- आकुलतां लभन्तेव्याकुल हो जाते हैं
त्वद्गोपुराग्रशिखराणि निरीक्षमाणाःTvad Gopuragra Shikharani Nirikshamanah
स्वर्गापवर्गपदवीं परमां श्रयन्तः ।Svargapavarga Padavim Paramam Shrayantah
मर्त्या मनुष्यभुवने मतिमाश्रयन्तेMartya Manushya Bhuvane Matim Ashrayante
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥Sri Venkatachalapate Tava Suprabhatam
आपके गोपुरों के शिखरों के दर्शन मात्र से मनुष्य स्वयं को स्वर्ग और मोक्ष के परम पद पर पहुँचा हुआ अनुभव करते हैं, और इसलिए इसी मनुष्य लोक में (आपके समीप) रहने का मन बना लेते हैं। हे श्री वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।
- त्वद्गोपुराग्रशिखराणिआपके गोपुरों के शिखर
- निरीक्षमाणाःनिहारते हुए
- स्वर्गापवर्गपदवींस्वर्ग और मोक्ष का पद
- परमां श्रयन्तःपरम पद को पाते हुए
- मर्त्याःमनुष्य
- मनुष्यभुवनेमनुष्य लोक में
- मतिम् आश्रयन्तेमन लगाते हैं
श्रीभूमिनायक दयादिगुणामृताब्धेSri Bhumi Nayaka Dayadi Gunamritabdhe
देवाधिदेव जगदेकशरण्यमूर्ते ।Devadhideva Jagadeka Sharanya Murte
श्रीमन्ननन्तगरुडादिभिरर्चिताङ्घ्रेSriman Ananta Garudadibhir Architanghre
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥Sri Venkatachalapate Tava Suprabhatam
हे श्रीदेवी और भूदेवी के स्वामी, दया आदि गुणों के अमृत-सागर! हे देवाधिदेव, जगत के एकमात्र शरणदाता! हे श्रीमान, जिनके चरणों की पूजा अनंत, गरुड़ आदि करते हैं! हे श्री वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।
- श्रीभूमिनायकहे श्रीदेवी और भूदेवी के स्वामी
- दयादिगुणामृताब्धेहे दया आदि गुणों के अमृत-सागर
- देवाधिदेवहे देवाधिदेव
- जगदेकशरण्यमूर्तेहे जगत के एकमात्र शरणदाता
- श्रीमन्हे श्रीमान
- अनन्तगरुडादिभिःअनंत, गरुड़ आदि द्वारा
- अर्चिताङ्घ्रेजिनके चरण पूजित हैं
श्रीपद्मनाभ पुरुषोत्तम वासुदेवSri Padmanabha Purushottama Vasudeva
वैकुण्ठ माधव जनार्दन चक्रपाणे ।Vaikuntha Madhava Janardana Chakrapane
श्रीवत्सचिह्न शरणागतपारिजातSrivatsa Chihna Sharanagata Parijata
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥Sri Venkatachalapate Tava Suprabhatam
हे पद्मनाभ, पुरुषोत्तम, वासुदेव! हे वैकुंठ, माधव, जनार्दन, चक्रपाणि! हे श्रीवत्स-चिह्नधारी, शरणागतों के लिए पारिजात वृक्ष! हे श्री वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।
- श्रीपद्मनाभहे पद्मनाभ
- पुरुषोत्तमहे पुरुषोत्तम
- वासुदेवहे वासुदेव
- वैकुण्ठहे वैकुंठनाथ
- माधवहे माधव
- जनार्दनहे जनार्दन
- चक्रपाणेहे चक्रपाणि
- श्रीवत्सचिह्नहे श्रीवत्स-चिह्न धारी
- शरणागतपारिजातहे शरणागतों के लिए पारिजात
कन्दर्पदर्पहरसुन्दरदिव्यमूर्तेKandarpa Darpa Hara Sundara Divya Murte
कान्ताकुचाम्बुरुहकुड्मललोलदृष्टे ।Kanta Kuchamburuha Kudmala Lola Drishte
कल्याणनिर्मलगुणाकरदिव्यकीर्तेKalyana Nirmala Gunakara Divya Kirte
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥Sri Venkatachalapate Tava Suprabhatam
हे सुंदर दिव्यमूर्ति, जो कामदेव के सौंदर्य-गर्व को भी हर लेते हैं; जिनकी प्रेमभरी दृष्टि प्रिया लक्ष्मी पर टिकी रहती है; हे कल्याणकारी निर्मल गुणों की खान, दिव्य कीर्ति वाले! हे श्री वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।
- कन्दर्पदर्पहरकामदेव का दर्प हरने वाले
- सुन्दरदिव्यमूर्तेहे सुंदर दिव्यमूर्ति
- कान्ताकुचाम्बुरुहकुड्मलप्रिया लक्ष्मी के कमल-कली समान वक्ष
- लोलदृष्टेजिनकी दृष्टि प्रेम से टिकी है
- कल्याणनिर्मलगुणाकरकल्याणकारी निर्मल गुणों की खान
- दिव्यकीर्तेहे दिव्य कीर्ति वाले
संस्कृत में लक्ष्मी जी के सौंदर्य की एक पारंपरिक उपमा है; हमने अर्थ में उसका भाव सरल शब्दों में दिया है।
मीनाकृते कमठकोलनृसिंहवर्णिन्Minakrite Kamatha Kola Nrisimha Varnin
स्वामिन् परश्वथतपोधन रामचन्द्र ।Svamin Parashvatha Tapodhana Ramachandra
शेषांशराम यदुनन्दन कल्किरूपSheshamsha Rama Yadunandana Kalki Rupa
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥Sri Venkatachalapate Tava Suprabhatam
हे मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह और वामन रूप धारण करने वाले स्वामी! हे फरसाधारी तपस्वी परशुराम, हे रामचंद्र! हे शेषांश बलराम, हे यदुनंदन कृष्ण, हे कल्कि रूप! हे श्री वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।
- मीनाकृतेहे मत्स्य रूपधारी
- कमठकूर्म
- कोलवराह
- नृसिंहनृसिंह
- वर्णिन्ब्रह्मचारी वामन
- स्वामिन्हे स्वामी
- परश्वथतपोधनफरसाधारी तपस्वी परशुराम
- रामचन्द्रश्री रामचंद्र
- शेषांशरामशेषांश बलराम
- यदुनन्दनयदुनंदन कृष्ण
- कल्किरूपहे कल्कि रूप
एक ही श्लोक में विष्णु के दस अवतार।
एलालवङ्गघनसारसुगन्धितीर्थंEla Lavanga Ghanasara Sugandhi Tirtham
दिव्यं वियत्सरिति हेमघटेषु पूर्णम् ।Divyam Viyat Sariti Hema Ghateshu Purnam
धृत्वाऽद्य वैदिकशिखामणयः प्रहृष्टाःDhritvadya Vaidika Shikhamanayah Prahrishtah
तिष्ठन्ति वेङ्कटपते तव सुप्रभातम् ॥Tishthanti Venkatapate Tava Suprabhatam
वैदिक विद्वानों में श्रेष्ठ ब्राह्मण आज आकाशगंगा के दिव्य जल को, जो इलायची, लौंग और कपूर से सुगंधित है, सोने के घड़ों में भरकर प्रसन्नता से (आपके अभिषेक के लिए) खड़े हैं। हे वेंकटपति, आपका सुप्रभात हो।
- एलालवङ्गघनसारइलायची, लौंग और कपूर
- सुगन्धितीर्थंसुगंधित तीर्थजल
- दिव्यंदिव्य
- वियत्सरितिआकाशगंगा से
- हेमघटेषु पूर्णम्सोने के घड़ों में भरा
- धृत्वाधारण करके
- अद्यआज
- वैदिकशिखामणयःवैदिक विद्वानों में शिरोमणि
- प्रहृष्टाःप्रसन्न होकर
- तिष्ठन्तिखड़े हैं
- वेङ्कटपतेहे वेंकटपति
भास्वानुदेति विकचानि सरोरुहाणिBhasvan Udeti Vikachani Saroruhani
सम्पूरयन्ति निनदैः ककुभो विहङ्गाः ।Sampurayanti Ninadaih Kakubho Vihangah
श्रीवैष्णवास्सततमर्थितमङ्गलास्तेSri Vaishnavas Satatam Arthita Mangalaste
धामाश्रयन्ति तव वेङ्कट सुप्रभातम् ॥Dhamashrayanti Tava Venkata Suprabhatam
तेजस्वी सूर्य उदय हो रहा है, कमल खिल उठे हैं, पक्षी अपने कलरव से दिशाओं को भर रहे हैं। सदा आपके मंगल की कामना करने वाले श्रीवैष्णव भक्त आपके धाम में आ पहुँचे हैं। हे वेंकट, आपका सुप्रभात हो।
- भास्वान् उदेतितेजस्वी सूर्य उदय हो रहा है
- विकचानि सरोरुहाणिकमल खिल गए हैं
- सम्पूरयन्तिभर रहे हैं
- निनदैःकलरव से
- ककुभःदिशाओं को
- विहङ्गाःपक्षी
- श्रीवैष्णवाःश्रीवैष्णव भक्त
- सततम् अर्थितमङ्गलाःसदा आपके मंगल की कामना करते
- धाम आश्रयन्तिआपके धाम में आ पहुँचे हैं
- वेङ्कटहे वेंकट
ब्रह्मादयस्सुरवरास्समहर्षयस्तेBrahmadayas Suravaras Samaharshayaste
सन्तस्सनन्दनमुखास्त्वथ योगिवर्याः ।Santas Sanandana Mukhas Tvatha Yogivaryah
धामान्तिके तव हि मङ्गलवस्तुहस्ताःDhamantike Tava Hi Mangala Vastu Hastah
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥Sri Venkatachalapate Tava Suprabhatam
ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता महर्षियों सहित, सनंदन आदि संत और श्रेष्ठ योगीजन हाथों में मंगल-द्रव्य लिए आपके धाम के समीप खड़े हैं। हे श्री वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।
- ब्रह्मादयः सुरवराःब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता
- समहर्षयःमहर्षियों सहित
- तेवे
- सन्तःसंतजन
- सनन्दनमुखाःसनंदन आदि
- तु अथ योगिवर्याःऔर श्रेष्ठ योगी
- धामान्तिकेआपके धाम के समीप
- मङ्गलवस्तुहस्ताःहाथों में मंगल-द्रव्य लिए
लक्ष्मीनिवास निरवद्यगुणैकसिन्धोLakshmi Nivasa Niravadya Gunaika Sindho
संसारसागरसमुत्तरणैकसेतो ।Samsara Sagara Samuttaranaika Seto
वेदान्तवेद्यनिजवैभव भक्तभोग्यVedanta Vedya Nija Vaibhava Bhakta Bhogya
श्रीवेङ्कटाचलपते तव सुप्रभातम् ॥Sri Venkatachalapate Tava Suprabhatam
हे लक्ष्मीनिवास, निर्दोष गुणों के एकमात्र सागर! हे संसार-सागर से पार उतारने वाले एकमात्र सेतु! हे वेदांत से जाने जाने वाले वैभव वाले, भक्तों के परम आनंद! हे श्री वेंकटाचलपति, आपका सुप्रभात हो।
- लक्ष्मीनिवासहे लक्ष्मी के निवास
- निरवद्यगुणैकसिन्धोहे निर्दोष गुणों के एकमात्र सागर
- संसारसागरसमुत्तरणैकसेतोहे संसार-सागर पार करने के एकमात्र सेतु
- वेदान्तवेद्यनिजवैभवजिनका वैभव वेदांत से जाना जाता है
- भक्तभोग्यहे भक्तों के आनंद-स्वरूप
इत्थं वृषाचलपतेरिह सुप्रभातंIttham Vrishachalapater Iha Suprabhatam
ये मानवाः प्रतिदिनं पठितुं प्रवृत्ताः ।Ye Manavah Pratidinam Pathitum Pravrittah
तेषां प्रभातसमये स्मृतिरङ्गभाजांTesham Prabhata Samaye Smritir Angabhajam
प्रज्ञां परार्थसुलभां परमां प्रसूते ॥Prajnam Parartha Sulabham Paramam Prasute
जो मनुष्य वृषाचलपति के इस सुप्रभात का प्रतिदिन पाठ करने में लगे रहते हैं, परंपरा के अनुसार प्रभात समय का यह स्मरण उन्हें वह परम प्रज्ञा प्रदान करता है जिससे जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य सुलभ हो जाता है।
- इत्थंइस प्रकार
- वृषाचलपतेःवृषाचल के स्वामी का
- इह सुप्रभातंयह सुप्रभात
- ये मानवाःजो मनुष्य
- प्रतिदिनंप्रतिदिन
- पठितुं प्रवृत्ताःपढ़ने में लगे रहते हैं
- तेषांउनके लिए
- प्रभातसमयेप्रभात समय में
- स्मृतिःयह स्मरण
- अङ्गभाजांदेहधारियों का
- प्रज्ञांप्रज्ञा
- परार्थसुलभांपरम पुरुषार्थ को सुलभ करने वाली
- परमां प्रसूतेपरम (प्रज्ञा) को जन्म देता है
यह अंतिम श्लोक फलश्रुति है, जो सुप्रभातम् के पाठ का फल बताता है।
पूर्ण
श्री वेंकटेश सुप्रभातम् का पाठ पूर्ण हुआ।
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प्रश्न
सुप्रभातम् किस समय गाना या सुनना चाहिए?
सुबह जल्दी, हो सके तो ब्रह्म मुहूर्त में, यानी सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पहले। तिरुमला में प्रभु को जगाने के लिए इसे भोर से पहले गाया जाता है। घर पर बहुत से परिवार नहाने के बाद, दिन शुरू होने से पहले इसे सुनते या पढ़ते हैं। देर से उठें, तब भी सुबह श्रद्धा से पढ़ना अच्छा है।
वेंकटेश्वर सुप्रभातम् किसने लिखा?
प्रतिवादि भयंकरम् अण्णंगराचार्य ने, जिन्हें प्यार से अण्णन् कहते हैं। वे १५वीं शताब्दी के श्रीवैष्णव विद्वान और मणवाळ मामुनिगळ के शिष्य थे। केवल पहला श्लोक पुराना है। वह वाल्मीकि रामायण से है, जहाँ विश्वामित्र "कौसल्या सुप्रजा राम" कहकर बालक राम को जगाते हैं।
वेंकटेश्वर सुप्रभातम् में कितने श्लोक हैं?
२९, जिनमें अंतिम फलश्रुति है। इस पृष्ठ पर यही भाग है, और इसके पाठ में लगभग १०–१२ मिनट लगते हैं। पूरे प्रातःपाठ में उन्हीं कवि के तीन और स्तोत्र जुड़ते हैं: वेंकटेश स्तोत्रम् (११ श्लोक), प्रपत्ति (१६) और मंगलाशासनम् (१४)। प्रचलित संस्करण में कुल लगभग ७० श्लोक होते हैं। ये तीन स्तोत्र अभी इस पृष्ठ पर नहीं हैं।
रोज़ सुप्रभातम् सुनने के क्या लाभ हैं?
परंपरा के अनुसार भोर में इस स्तोत्र से प्रभु को याद करने से मन शांत और साफ़ होता है, और इसका अंतिम श्लोक उत्तम प्रज्ञा की बात करता है। बहुत से परिवारों को लगता है कि इससे घर में दिन की शुरुआत शांत और मंगलमय होती है। ये भक्ति की मान्यताएँ हैं, कोई गारंटी नहीं।
क्या तिरुमला में पूरे वर्ष सुप्रभातम् गाया जाता है?
लगभग। धनुर्मास (तमिल मार्गऴि मास, लगभग मध्य दिसंबर से मध्य जनवरी) में तिरुमला में इसकी जगह आंडाल की तिरुप्पावै गाई जाती है। बहुत से परिवार घर पर भी ऐसा ही करते हैं और महीना पूरा होने पर फिर सुप्रभातम् शुरू करते हैं।
स्रोत और समीक्षा
स्रोत: Sri Venkatesa Suprabhatam (Suprabhatam section, 29 shlokas) as recited in the Tirumala Suprabhata Seva; text collated from sanskritdocuments.org (venkatsp), stotranidhi.com (Devanagari edition), sa.wikisource.org (श्रीवेङ्कटेशसुप्रभातम्) and shlokam.org
Opening verse from Valmiki Ramayana, Bala Kanda 23.2. Where editions differ we follow the majority reading: 9 तन्त्रीप्रकर्ष (not प्रहर्ष) and करचाररम्यं (not करचारु); 14 हरविरिञ्चि (some print विरिञ्च); 17 महिमाधिकम् (some print महिमादिकम्); 24 परश्वथ (sanskritdocuments has परश्वध); 25 सुगन्धि (stotranidhi has सुगन्ध); 27 मुखास्त्वथ (variant मुखास्तव). The double avagraha (ऽऽ) some editions print in 14 and 19 is omitted, which is standard orthography and does not change the sound. Meanings are Nitya's own.
मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।
ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।