श्री दुर्गा चालीसा
Durga Chalisa
श्री दुर्गा चालीसा माँ दुर्गा की चालीस चौपाइयों वाली हिंदी स्तुति है, जो 'नमो नमो दुर्गे सुख करनी' से शुरू होती है। इसमें गौरी और लक्ष्मी से लेकर काली और महाविद्याओं तक, माँ के अनेक रूपों का गुणगान है, और महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ और रक्तबीज पर उनकी विजय की याद है। परिवार इसे मंगलवार, शुक्रवार और नवरात्रि के हर दिन पढ़ते हैं।
- 42 पद
- 9 मिनट
- पारंपरिक; अंतिम चौपाई में देवीदास का नाम
- उत्तम दिन: मंगलवार, शुक्रवार
नमो नमो दुर्गे सुख करनी।Namo Namo Durge Sukh Karni
नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥Namo Namo Ambe Dukh Harni
हे सुख देने वाली दुर्गा माँ, आपको बार-बार नमस्कार है। हे दुःख हरने वाली अम्बा माँ, आपको बार-बार नमस्कार है।
कुछ पुस्तकों में दूसरी पंक्ति में भी 'दुर्गे' छपा है ('नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी')। हमने 'अम्बे' रखा है, जो अधिकतर स्रोतों में है।
निरंकार है ज्योति तुम्हारी।Nirankar Hai Jyoti Tumhari
तिहूँ लोक फैली उजियारी॥Tihun Lok Phaili Ujiyari
आपकी ज्योति निराकार है, और उसका उजाला तीनों लोकों में फैला है।
शशि ललाट मुख महाविशाला।Shashi Lalat Mukh Mahavishala
नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥Netra Lal Bhrikuti Vikrala
आपके ललाट पर चंद्रमा है और मुख अत्यंत विशाल है। आपके नेत्र लाल हैं और भौंहें विकराल हैं।
रूप मातु को अधिक सुहावे।Roop Matu Ko Adhik Suhave
दरश करत जन अति सुख पावे॥Darash Karat Jan Ati Sukh Pave
माँ का रूप अत्यंत सुहावना है। जो उनके दर्शन करता है, उसे बहुत सुख मिलता है।
तुम संसार शक्ति लय कीना।Tum Sansar Shakti Lay Kina
पालन हेतु अन्न धन दीना॥Palan Hetu Ann Dhan Dina
आपकी शक्ति से ही संसार बनता और लय होता है। उसके पालन के लिए आपने अन्न और धन दिया।
कुछ पुस्तकों में 'शक्ति लय कीना' के स्थान पर 'शक्ति लै कीना' (शक्ति लेकर संसार बनाया) है। अर्थ लगभग एक ही है।
अन्नपूर्णा हुई जग पाला।Annapurna Hui Jag Pala
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥Tum Hi Aadi Sundari Bala
अन्नपूर्णा बनकर आप जगत का पालन करती हैं। आप ही आदि सुंदरी बाला हैं।
प्रलयकाल सब नाशन हारी।Pralaykal Sab Nashan Hari
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥Tum Gauri Shivshankar Pyari
प्रलय के समय आप ही सबका नाश करती हैं। आप ही शिवशंकर की प्रिया गौरी हैं।
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।Shiv Yogi Tumhre Gun Gaven
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥Brahma Vishnu Tumhen Nit Dhyaven
शिव जी और योगीजन आपके गुण गाते हैं। ब्रह्मा और विष्णु नित्य आपका ध्यान करते हैं।
रूप सरस्वती को तुम धारा।Roop Saraswati Ko Tum Dhara
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥De Subuddhi Rishi Munin Ubara
आपने सरस्वती का रूप धारण किया और ऋषि-मुनियों को सुबुद्धि देकर उनका उद्धार किया।
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।Dharyo Roop Narsingh Ko Amba
परगट भई फाड़कर खम्बा॥Pargat Bhai Phaadkar Khamba
हे अम्बा, आपने नरसिंह का रूप धारण किया और खंभा फाड़कर प्रकट हुईं।
यहाँ चालीसा देवी को विष्णु के अवतारों के पीछे की शक्ति के रूप में देखती है। बहुत से लोग 'परगट' को 'प्रगट' गाते हैं।
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।Raksha Kari Prahlad Bachayo
हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो॥Hirnakush Ko Swarg Pathayo
आपने रक्षा करके प्रह्लाद को बचाया और हिरण्यकशिपु को स्वर्ग भेज दिया।
कुछ पुस्तकों में यहाँ 'हिरण्याक्ष' छपा है। हमने 'हिरणाकुश' (हिरण्यकशिपु) रखा है, जो प्रह्लाद के पिता थे और जिनका वध नरसिंह ने किया। 'स्वर्ग पठायो' का भाव है कि भगवान के हाथों मृत्यु से उसकी मुक्ति हुई।
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।Lakshmi Roop Dharo Jag Mahin
श्री नारायण अंग समाहीं॥Shri Narayan Ang Samahin
संसार में आपने लक्ष्मी का रूप धारण किया और आप श्री नारायण के अंग में समाई रहती हैं।
क्षीरसिन्धु में करत विलासा।Kshirsindhu Mein Karat Vilasa
दयासिन्धु दीजै मन आसा॥Dayasindhu Dijai Man Aasa
आप क्षीरसागर में आनंद से विराजती हैं। हे दया की सागर, मेरे मन की आशा पूरी कीजिए।
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।Hinglaj Mein Tumhin Bhavani
महिमा अमित न जात बखानी॥Mahima Amit Na Jaat Bakhani
हिंगलाज में आप ही भवानी रूप में विराजती हैं। आपकी महिमा अपार है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
हिंगलाज माता का मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान में है। परंपरा इसे शक्तिपीठों में गिनती है।
मातंगी अरु धूमावति माता।Matangi Aru Dhumavati Mata
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥Bhuvaneshwari Bagla Sukh Data
आप ही मातंगी और धूमावती माता हैं। आप ही सुख देने वाली भुवनेश्वरी और बगला हैं।
पद १५ और १६ में दस महाविद्याओं के रूपों के नाम हैं, जो शाक्त परंपरा की प्रमुख देवियाँ हैं।
श्री भैरव तारा जग तारिणी।Shri Bhairav Tara Jag Tarini
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥Chhinna Bhal Bhav Dukh Nivarini
आप ही भैरवी हैं, जगत को तारने वाली तारा हैं। छिन्नमस्ता रूप में आप संसार के दुःख दूर करती हैं।
यहाँ 'भैरव' से भैरवी और 'छिन्न भाल' से छिन्नमस्ता का अर्थ लिया जाता है; ये दोनों भी महाविद्याएँ हैं।
केहरि वाहन सोह भवानी।Kehari Vahan Soh Bhavani
लांगुर वीर चलत अगवानी॥Langur Veer Chalat Agvani
सिंह पर सवार भवानी शोभा पाती हैं, और वीर लांगुर उनके आगे-आगे चलते हैं।
उत्तर भारत की देवी-उपासना में माँ के आगे चलने वाले 'लांगुर' या 'लांगुरिया' को प्रायः हनुमान जी माना जाता है; कुछ परिवार भैरव जी को मानते हैं।
कर में खप्पर खड्ग विराजै।Kar Mein Khappar Khadag Viraje
जाको देख काल डर भाजै॥Jako Dekh Kaal Dar Bhaje
आपके हाथों में खप्पर और खड्ग शोभित हैं, जिन्हें देखकर काल भी डरकर भाग जाता है।
सोहै अस्त्र और त्रिशूला।Sohai Astra Aur Trishula
जाते उठत शत्रु हिय शूला॥Jate Uthat Shatru Hiy Shula
आपके पास अस्त्र और त्रिशूल शोभा पाते हैं, जिनसे शत्रुओं के हृदय में शूल उठता है।
नगरकोट में तुम्हीं विराजत।Nagarkot Mein Tumhin Virajat
तिहुँ लोक में डंका बाजत॥Tihun Lok Mein Danka Bajat
नगरकोट में आप ही विराजती हैं, और तीनों लोकों में आपका डंका बजता है।
नगरकोट हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा का पुराना नाम है, जहाँ ब्रजेश्वरी देवी का मंदिर है। कुछ पुस्तकों में 'नगर कोटि' छपा है।
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे।Shumbh Nishumbh Danav Tum Maare
रक्तबीज शंखन संहारे॥Raktabeej Shankhan Sanhare
आपने शुम्भ और निशुम्भ दानवों को मारा, और अनगिनत रूपों में फैले रक्तबीज का संहार किया।
'शंखन' शंख (एक बहुत बड़ी संख्या) से है। रक्तबीज के खून की हर बूँद से नया दैत्य पैदा होता था, इसलिए वे अनगिनत हो गए थे।
महिषासुर नृप अति अभिमानी।Mahishasur Nrip Ati Abhimani
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥Jehi Agh Bhaar Mahi Akulani
राजा महिषासुर बहुत अभिमानी था, जिसके पापों के भार से धरती व्याकुल हो उठी थी।
रूप कराल कालिका धारा।Roop Karal Kalika Dhara
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥Sen Sahit Tum Tihi Sanhara
आपने कालिका का विकराल रूप धारण किया और उसे उसकी सेना सहित नष्ट कर दिया।
परी गाढ़ सन्तन पर जब जब।Pari Gaadh Santan Par Jab Jab
भई सहाय मातु तुम तब तब॥Bhai Sahay Matu Tum Tab Tab
जब-जब संतों पर संकट पड़ा, तब-तब हे माँ, आप उनकी सहायक बनीं।
अमरपुरी अरु बासव लोका।Amarpuri Aru Basav Loka
तब महिमा सब रहें अशोका॥Tab Mahima Sab Rahen Ashoka
देवताओं की नगरी और इंद्र का लोक, सब आपकी महिमा से शोक रहित रहते हैं।
'बासव' इंद्र का नाम वासव है। यहाँ 'तब' पुराना रूप 'तव' है, यानी 'आपकी'।
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।Jwala Mein Hai Jyoti Tumhari
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥Tumhen Sada Poojen Nar Nari
ज्वाला में आपकी ही ज्योति है; नर-नारी सदा आपकी पूजा करते हैं।
इसे प्रायः हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में ज्वालामुखी मंदिर से जोड़ा जाता है, जहाँ प्राकृतिक ज्योतियों की देवी रूप में पूजा होती है।
प्रेम भक्ति से जो यश गावें।Prem Bhakti Se Jo Yash Gaven
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥Dukh Daridra Nikat Nahin Aaven
जो प्रेम और भक्ति से आपका यश गाते हैं, दुःख और दरिद्रता उनके पास नहीं आते।
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।Dhyave Tumhen Jo Nar Man Laai
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥Janam Maran Tako Chhuti Jaai
जो मनुष्य मन लगाकर आपका ध्यान करता है, वह जन्म-मरण के बंधन से छूट जाता है।
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।Jogi Sur Muni Kahat Pukari
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥Yog Na Ho Bin Shakti Tumhari
योगी, देवता और मुनि पुकारकर कहते हैं कि आपकी शक्ति के बिना योग सिद्ध नहीं होता।
शंकर आचारज तप कीनो।Shankar Aacharaj Tap Kino
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥Kaam Aru Krodh Jeeti Sab Lino
शंकराचार्य ने तप किया और काम व क्रोध, सबको जीत लिया।
पद ३० से ३४ तक शंकराचार्य से जुड़ी एक भक्ति-कथा है। इसका भाव है कि महान संत को भी माँ की शक्ति चाहिए; यह इतिहास का विवरण नहीं है।
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।Nishidin Dhyan Dharo Shankar Ko
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥Kahu Kaal Nahin Sumiro Tumko
वे दिन-रात भगवान शंकर का ध्यान करते रहे, पर कभी आपका स्मरण नहीं किया।
शक्ति रूप का मरम न पायो।Shakti Roop Ka Maram Na Payo
शक्ति गई तब मन पछितायो॥Shakti Gayi Tab Man Pachhitayo
वे आपके शक्ति रूप का रहस्य नहीं समझ पाए। जब उनकी शक्ति चली गई, तब उनके मन में पछतावा हुआ।
शरणागत हुई कीर्ति बखानी।Sharanagat Hui Kirti Bakhani
जय जय जय जगदम्ब भवानी॥Jai Jai Jai Jagdamb Bhavani
तब उन्होंने आपकी शरण लेकर आपकी कीर्ति गाई: जय जय जय जगदम्बा भवानी!
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।Bhai Prasann Aadi Jagdamba
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥Dai Shakti Nahin Keen Vilamba
आदि जगदम्बा प्रसन्न हुईं और बिना देर किए उन्हें शक्ति दे दी।
मोको मातु कष्ट अति घेरो।Moko Matu Kasht Ati Ghero
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥Tum Bin Kaun Harai Dukh Mero
हे माँ, मुझे बहुत कष्टों ने घेर रखा है। आपके बिना मेरा दुःख कौन हरेगा?
आशा तृष्णा निपट सतावें।Aasha Trishna Nipat Sataven
मोह मदादिक सब बिनशावें॥Moh Madadik Sab Binshaven
आशा और तृष्णा मुझे बहुत सताती हैं। मोह, मद आदि सब दोषों को नष्ट कर दीजिए।
कुछ पुस्तकों में यहाँ दूसरी पंक्ति अलग है: 'रिपु मूरख मोहि अति डरपावे' (मूर्ख शत्रु मुझे बहुत डराते हैं)।
शत्रु नाश कीजै महारानी।Shatru Naash Kijai Maharani
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥Sumiraun Ikchit Tumhen Bhavani
हे महारानी, मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए। हे भवानी, मैं एकाग्र मन से आपका स्मरण करता हूँ।
परंपरा 'शत्रु' को बाहरी शत्रु और पिछले पद में बताए भीतर के शत्रु, दोनों के रूप में समझती है।
करो कृपा हे मातु दयाला।Karo Kripa He Matu Dayala
ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला॥Riddhi Siddhi Dai Karahu Nihala
हे दयालु माँ, कृपा कीजिए। ऋद्धि-सिद्धि देकर मुझे निहाल कर दीजिए।
जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ।Jab Lagi Jiun Daya Phal Paaun
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ॥Tumhro Yash Main Sada Sunaun
जब तक जिऊँ, आपकी दया का फल पाता रहूँ, और मैं सदा आपका यश सुनाता रहूँ।
श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।Shri Durga Chalisa Jo Koi Gavai
सब सुख भोग परमपद पावै॥Sab Sukh Bhog Parampad Pavai
जो कोई श्री दुर्गा चालीसा गाता है, वह सब सुख भोगकर परमपद पाता है।
यह फलश्रुति है, यानी पाठ के फल का पारंपरिक कथन। कुछ पुस्तकों में 'दुर्गा चालीसा जो नित गावै' या 'जो जन गावै' है।
देवीदास शरण निज जानी।Devidas Sharan Nij Jani
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥Karahu Kripa Jagdamb Bhavani
देवीदास को अपनी शरण में आया जानकर, हे जगदम्बा भवानी, उस पर कृपा कीजिए।
यहाँ कवि ने अपना नाम देवीदास दिया है, जैसे उस समय के कवि अंतिम पद में अपनी छाप देते थे। उनके बारे में भरोसेमंद जानकारी बहुत कम है।
शरणागत रक्षा करे, भक्त रहे निःशंक।Sharanagat Raksha Kare, Bhakt Rahe Nishank
मैं आया तेरी शरण में, मातु लीजिये अंक॥Main Aaya Teri Sharan Mein, Matu Lijiye Ank
आप शरण में आए की रक्षा करती हैं, इसलिए भक्त निडर रहता है। हे माँ, मैं आपकी शरण में आया हूँ, मुझे अपनी गोद में ले लीजिए।
बहुत-सी पुस्तिकाएँ इसी दोहे पर समाप्त होती हैं; कुछ पुरानी पुस्तकों में पाठ देवीदास वाली चौपाई पर ही पूरा हो जाता है।
पूर्ण
श्री दुर्गा चालीसा का पाठ पूर्ण हुआ।
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प्रश्न
दुर्गा चालीसा किसने लिखी?
पक्के तौर पर कोई नहीं जानता। अंतिम चौपाई में देवीदास का नाम आता है, इसलिए परंपरा इसका श्रेय इसी नाम के भक्त को देती है, पर उनके समय की भरोसेमंद जानकारी नहीं है। यह चालीसा मंदिरों, घर की पूजा और सस्ती आरती-पुस्तिकाओं के ज़रिए पूरे उत्तर भारत में फैली।
दुर्गा चालीसा कब पढ़नी चाहिए?
उत्तर भारत के ज़्यादातर घरों में मंगलवार और शुक्रवार देवी के दिन माने जाते हैं, और नवरात्रि इसका मुख्य समय है। बहुत से लोग नवरात्रि के हर दिन, सुबह या शाम दीपक जलाकर, एक बार पाठ करते हैं। दुर्गाष्टमी और दुर्गा पूजा के दिनों में भी इसे पढ़ते हैं।
क्या दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशती एक ही हैं?
नहीं। दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) सात सौ श्लोकों का संस्कृत ग्रंथ है। चालीसा छोटी-सी हिंदी स्तुति है, जिसमें उसकी कुछ कथाएँ याद की गई हैं। सप्तशती का पूरा पाठ दो-तीन घंटे लेता है, चालीसा दस मिनट से कम।
पाठ में कितना समय लगता है?
आराम से पढ़ें तो लगभग आठ से दस मिनट।
स्रोत और समीक्षा
स्रोत: Traditional Hindi text as printed in popular chalisa and aarti-sangrah booklets; cross-checked line by line against sanskritdocuments.org (doc_z_otherlang_hindi/durga40, both versions on that page), BhaktiBharat.com, Bharat Discovery (bharatdiscovery.org) and ShubhPanchang.com
Our base text follows the first sanskritdocuments.org version, which matches BhaktiBharat word for word. We depart from it in two places, following the 'mool paath' on sanskritdocuments.org, Bharat Discovery and ShubhPanchang: 'नमो नमो अम्बे दुःख हरनी' (base repeats 'दुर्गे', ch. 1) and 'हिरणाकुश' (base 'हिरण्याक्ष', which does not fit the Narasimha story, ch. 11). Other variants: 'लय/लै कीना' (ch. 5), 'परगट/प्रगट' (ch. 10), 'नगरकोट/नगर कोटि/नाग कोटि' (ch. 20), 'ज्वाला/ताही में' (ch. 26), 'मोह मदादिक सब बिनशावें' vs 'रिपु मूरख मोहि अति डरपावे' (ch. 36), 'श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै' vs 'जो नित/जो जन गावै' (ch. 40). The closing doha appears in BhaktiBharat and ShubhPanchang but not in the two other sources. Spelling of तिहुँ लोक normalised with a space. We have not yet compared against a Gita Press printing.
मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।
ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।