संकटमोचन हनुमानाष्टक
Sankat Mochan Hanuman Ashtak
संकटमोचन हनुमानाष्टक आठ छंदों और एक दोहे का स्तोत्र है, जिसमें हनुमान जी की संकटमोचन यानी संकट हरने वाले के रूप में स्तुति है, और परंपरा इसे गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानती है। ब्रज-प्रभावित हिंदी के हर छंद में किसी ऐसे प्रसंग की याद है जब हनुमान जी ने किसी का संकट हरा, और हर छंद 'को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो' पर ख़त्म होता है। इसका पाठ ख़ासकर मंगलवार और शनिवार को होता है।
- 9 पद
- 5 मिनट
- परंपरा से गोस्वामी तुलसीदास को आरोपित
- उत्तम दिन: मंगलवार, शनिवार
बाल समय रबि भक्षि लियो तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो।Baal Samay Ravi Bhakshi Liyo Tab, Teenahun Lok Bhayo Andhiyaro
ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो।Tahi Son Tras Bhayo Jag Ko, Yah Sankat Kahu Son Jat Na Taro
देवन आनि करी बिनती तब छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो।Devan Aani Kari Binati Tab, Chhandi Diyo Ravi Kasht Nivaro
को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥१॥Ko Nahin Janat Hai Jag Mein Kapi, Sankat Mochan Naam Tiharo
बाल्यकाल में आपने सूर्य को निगल लिया, जिससे तीनों लोकों में अंधकार छा गया। सारा संसार भयभीत हो उठा और यह संकट किसी से टाले न टला। तब देवताओं ने आकर विनती की, और आपने सूर्य को छोड़कर उनका कष्ट दूर किया। हे कपि! संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम 'संकटमोचन' (संकटों को हरने वाला) है?
बालि की त्रास कपीस बसै गिरि जात महाप्रभु पंथ निहारो।Bali Ki Tras Kapis Basai Giri, Jat Mahaprabhu Panth Niharo
चौंकि महा मुनि साप दियो तब चाहिय कौन बिचार बिचारो।Chaunki Maha Muni Sap Diyo Tab, Chahiya Kaun Bichar Bicharo
कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु सो तुम दास के सोक निवारो।Kai Dvij Roop Livay Mahaprabhu, So Tum Das Ke Sok Nivaro
को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥२॥Ko Nahin Janat Hai Jag Mein Kapi, Sankat Mochan Naam Tiharo
बालि के भय से वानरराज सुग्रीव उस पर्वत पर रहते थे जहाँ महामुनि के शाप के कारण बालि नहीं आ सकता था। मार्ग में महाप्रभु श्रीराम को आते देख वे चौंक उठे और सोचने लगे कि क्या करें। तब आपने ब्राह्मण का रूप धरकर प्रभु को उनके पास लाकर उस दास का शोक दूर किया। हे कपि! संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम 'संकटमोचन' (संकटों को हरने वाला) है?
किष्किंधाकांड: मतंग ऋषि के शाप के कारण बालि ऋष्यमूक पर्वत पर नहीं जा सकता था, इसलिए सुग्रीव वहाँ रहते थे। दूसरी पंक्ति के अर्थ पर टीकाकारों में भिन्न मत हैं।
अंगद के सँग लेन गये सिय खोज कपीस यह बैन उचारो।Angad Ke Sang Len Gaye Siya, Khoj Kapis Yah Bain Ucharo
जीवत ना बचिहौ हम सो जु बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो।Jeevat Na Bachihau Ham So Ju, Bina Sudhi Laye Ihan Pagu Dharo
हेरि थके तट सिंधु सबै तब लाय सिया-सुधि प्रान उबारो।Heri Thake Tat Sindhu Sabai Tab, Laye Siya Sudhi Pran Ubaro
को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥३॥Ko Nahin Janat Hai Jag Mein Kapi, Sankat Mochan Naam Tiharo
आप अंगद के साथ सीता जी की खोज में गए, जब वानरराज सुग्रीव ने कहा था: 'जो सीता जी का समाचार लाए बिना यहाँ पैर रखेगा, वह मुझसे जीवित नहीं बचेगा।' जब सब ढूँढ़-ढूँढ़कर समुद्र तट पर थककर बैठ गए, तब आपने सीता जी का समाचार लाकर सबके प्राण बचाए। हे कपि! संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम 'संकटमोचन' (संकटों को हरने वाला) है?
रावन त्रास दई सिय को सब राक्षसि सों कहि सोक निवारो।Ravan Tras Dai Siya Ko Sab, Rakshasi Son Kahi Sok Nivaro
ताहि समय हनुमान महाप्रभु जाय महा रजनीचर मारो।Tahi Samay Hanuman Mahaprabhu, Jaye Maha Rajanichar Maro
चाहत सीय असोक सों आगि सु दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो।Chahat Siya Asok Son Aagi Su, Dai Prabhu Mudrika Sok Nivaro
को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥४॥Ko Nahin Janat Hai Jag Mein Kapi, Sankat Mochan Naam Tiharo
रावण ने सीता जी को बहुत त्रास दिया और सब राक्षसियों से कहा कि उन्हें समझा-बुझाकर उनका शोक (और हठ) मिटाएँ। उसी समय हे महाप्रभु हनुमान, आपने जाकर बड़े-बड़े राक्षसों को मारा। जब सीता जी अशोक वृक्ष से आग माँग रही थीं, तब आपने प्रभु की अँगूठी देकर उनका शोक दूर किया। हे कपि! संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम 'संकटमोचन' (संकटों को हरने वाला) है?
सुंदरकांड: निराश सीता जी अशोक वृक्ष से अंगार माँगती हैं; उसी क्षण हनुमान जी श्रीराम की अँगूठी उनके सामने गिरा देते हैं।
बान लग्यो उर लछिमन के तब प्रान तजे सुत रावन मारो।Baan Lagyo Ur Lachhiman Ke Tab, Pran Taje Sut Ravan Maro
लै गृह बैद्य सुषेन समेत तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो।Lai Grih Baidya Sushen Samet, Tabai Giri Dron Su Beer Uparo
आनि सजीवन हाथ दई तब लछिमन के तुम प्रान उबारो।Aani Sajeevan Hath Dai Tab, Lachhiman Ke Tum Pran Ubaro
को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥५॥Ko Nahin Janat Hai Jag Mein Kapi, Sankat Mochan Naam Tiharo
जब रावण के पुत्र के चलाए बाण से लक्ष्मण जी के हृदय पर चोट लगी और उनके प्राण छूटने लगे, तब आप वैद्य सुषेण को उनके घर समेत उठा लाए, और फिर हे वीर, द्रोण पर्वत ही उखाड़ लाए। संजीवनी बूटी लाकर (वैद्य के) हाथ में दी और लक्ष्मण जी के प्राण बचाए। हे कपि! संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम 'संकटमोचन' (संकटों को हरने वाला) है?
लंकाकांड: मेघनाद की शक्ति से लक्ष्मण जी मूर्छित हुए; वैद्य सुषेण ने औषधि बताई, और पहचान न पाने पर हनुमान जी पूरा पर्वत ही उठा लाए।
रावन जुद्ध अजान कियो तब नाग कि फाँस सबै सिर डारो।Ravan Juddh Ajan Kiyo Tab, Naag Ki Phans Sabai Sir Daro
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल मोह भयो यह संकट भारो।Shri Raghunath Samet Sabai Dal, Moh Bhayo Yah Sankat Bharo
आनि खगेस तबै हनुमान जु बंधन काटि सुत्रास निवारो।Aani Khages Tabai Hanuman Ju, Bandhan Kati Sutras Nivaro
को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥६॥Ko Nahin Janat Hai Jag Mein Kapi, Sankat Mochan Naam Tiharo
जब रावण की ओर से अचानक (छलपूर्ण) युद्ध हुआ और सब पर नागपाश डाल दिया गया, तब श्री रघुनाथ जी सहित सारा दल मूर्छित हो गया। यह भारी संकट था। तब हे हनुमान जी, आपने गरुड़ जी को लाकर बंधन कटवाए और यह भय दूर किया। हे कपि! संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम 'संकटमोचन' (संकटों को हरने वाला) है?
लंकाकांड: मेघनाद ने श्रीराम, लक्ष्मण और सेना को नागपाश में बाँधा; सर्पों के शत्रु गरुड़ जी ने उन्हें मुक्त किया।
बंधु समेत जबै अहिरावन लै रघुनाथ पताल सिधारो।Bandhu Samet Jabai Ahiravan, Lai Raghunath Patal Sidharo
देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो।Debihi Pooji Bhali Bidhi Son Bali, Deu Sabai Mili Mantra Bicharo
जाय सहाय भयो तब ही अहिरावन सैन्य समेत सँहारो।Jaye Sahay Bhayo Tab Hi, Ahiravan Sainya Samet Sanharo
को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥७॥Ko Nahin Janat Hai Jag Mein Kapi, Sankat Mochan Naam Tiharo
जब अहिरावण श्री रघुनाथ जी को भाई लक्ष्मण सहित पाताल ले गया, और (राक्षसों ने) देवी की विधिवत पूजा करके सबने मिलकर उनकी बलि देने की योजना बनाई, तब आपने जाकर सहायता की और अहिरावण को उसकी सेना सहित मार डाला। हे कपि! संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम 'संकटमोचन' (संकटों को हरने वाला) है?
अहिरावण का प्रसंग वाल्मीकि रामायण या रामचरितमानस में नहीं, बाद की रामकथा परंपराओं में मिलता है।
काज किये बड़ देवन के तुम बीर महाप्रभु देखि बिचारो।Kaj Kiye Bad Devan Ke Tum, Beer Mahaprabhu Dekhi Bicharo
कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसों नहिं जात है टारो।Kaun So Sankat Mor Gareeb Ko, Jo Tumson Nahin Jat Hai Taro
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो।Begi Haro Hanuman Mahaprabhu, Jo Kachhu Sankat Hoy Hamaro
को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥८॥Ko Nahin Janat Hai Jag Mein Kapi, Sankat Mochan Naam Tiharo
हे वीर महाप्रभु, आपने देवताओं के बड़े-बड़े कार्य किए हैं। देखिए और विचार कीजिए, मुझ गरीब का ऐसा कौन सा संकट है जो आपसे टाला न जा सके? हे महाप्रभु हनुमान, मेरा जो भी संकट हो, उसे शीघ्र हर लीजिए। हे कपि! संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम 'संकटमोचन' (संकटों को हरने वाला) है?
लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लँगूर।Lal Deh Lali Lase, Aru Dhari Lal Langoor
बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥Bajra Deh Danav Dalan, Jai Jai Jai Kapi Soor
आपकी लाल देह पर सिंदूर की लाली शोभा दे रही है और आपकी पूँछ भी लाल है। वज्र के समान देह वाले, दानवों का दलन करने वाले, हे वीर कपि, आपकी जय हो, जय हो, जय हो!
हनुमान जी को परंपरा से सिंदूर चढ़ाया जाता है; लाल रंग और मंगल ग्रह का दिन मंगलवार उनसे विशेष रूप से जुड़ा है।
पूर्ण
संकटमोचन हनुमानाष्टक का पाठ पूर्ण हुआ।
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प्रश्न
'संकटमोचन' का क्या अर्थ है?
संकट से छुड़ाने वाला। 'संकट' यानी विपत्ति और 'मोचन' यानी छुड़ाना। यह हनुमान जी के सबसे प्रिय नामों में से एक है, और इस अष्टक का हर छंद यही पूछकर ख़त्म होता है कि संसार में कौन नहीं जानता कि आपका नाम संकटमोचन है।
संकटमोचन हनुमानाष्टक किसने लिखा?
परंपरा इसे गोस्वामी तुलसीदास की रचना मानती है, और कुछ छपाइयों की पुष्पिका में उनका नाम भी है। इसकी भाषा और ब्रज-प्रभावित सवैया छंद उनके समय की भक्ति-कविता से मेल खाते हैं। फिर भी बजरंग बाण की तरह इसके रचयिता की बात पक्के तौर पर सिद्ध नहीं है। गीता प्रेस इसे हनुमान चालीसा के साथ छापता है।
संकटमोचन अष्टक का पाठ कब करें?
मंगलवार और शनिवार को, प्रायः हनुमान चालीसा के ठीक बाद। बहुत से लोग मुश्किल के समय भी इसका पाठ करते हैं, क्योंकि हर छंद में हनुमान जी किसी को संकट से निकालते हैं। परंपरा के अनुसार श्रद्धा से पाठ करने पर हनुमान जी सहायता करते हैं। कितनी बार पाठ करें, इसका कोई तय नियम नहीं है।
'बाल समय रबि भक्षि लियो' किस प्रसंग की बात है?
हनुमान जी के बचपन की। शिशु हनुमान ने उगते सूरज को पका फल समझकर निगल लिया और तीनों लोकों में अँधेरा छा गया। देवताओं ने विनती की, तब उन्होंने सूर्य को छोड़ दिया।
क्या इस अष्टक का वाराणसी के संकटमोचन मंदिर से कोई संबंध है?
दोनों का नाम एक है, और परंपरा दोनों को तुलसीदास जी से जोड़ती है।
स्रोत और समीक्षा
स्रोत: Sankatmochan Hanumanashtak, Gita Press Gorakhpur reading (appendix to Gita Press's Shri Ramcharitmanas; scanned copy on archive.org), cross-checked with sanskritdocuments.org (doc_z_otherlang_hindi/sankatamochana)
The two sources agree line for line. Gita Press joins postpositions (जगमें, तुमसों), which we keep; OCR slips in the scan (e.g. भशक्षि, चौकि) were corrected against sanskritdocuments.org. The sanskritdocuments.org text adds a closing chant ('सियावर रामचन्द्र पद गहि रहुँ…') not found in the Gita Press printing. Each stanza is shown as four lines, the fourth being the refrain.
मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।
ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।