श्री हनुमान जी की आरती
Hanuman Aarti
'आरती कीजै हनुमान लला की' हनुमान जी की जानी-मानी आरती है, सरल हिंदी का एक पारंपरिक भक्ति-गीत, जिसके रचयिता का नाम नहीं मिलता। इसकी टेक और छह छोटे पदों में लंका-दहन, संजीवनी और अहिरावण-वध की कथा आती है। लोग इसे दीपक घुमाते हुए गाते हैं, प्रायः हनुमान चालीसा के ठीक बाद, और ख़ासकर मंगलवार, शनिवार और हनुमान जयंती पर।
- 7 पद
- 4 मिनट
- पारंपरिक
- उत्तम दिन: मंगलवार, शनिवार
आरती कीजै हनुमान लला की।Aarti Kijai Hanuman Lala Ki
दुष्टदलन रघुनाथ कला की॥Dusht Dalan Raghunath Kala Ki
आइए, प्यारे हनुमान लला की आरती करें, जो दुष्टों का दलन करने वाले और श्री रघुनाथ जी की दिव्य शक्ति के स्वरूप हैं।
- आरतीआरती
- कीजैकीजिए
- हनुमानहनुमान
- ललाप्यारे लाल
- कीकी
- दुष्टदलनदुष्टों का नाश करने वाले
- रघुनाथश्री रघुनाथ
- कलाशक्ति, अंश
'लला' प्यारे बच्चे के लिए दुलार का शब्द है। आरती हनुमान जी को वात्सल्य भाव से पुकारती है। यह टेक हर पद के बाद दोहराई जाती है।
जाके बल से गिरिवर काँपै।Jake Bal Se Girivar Kanpai
रोग-दोष जाके निकट न झाँपै॥Rog Dosh Jake Nikat Na Jhanpai
अंजनि पुत्र महा बलदाई।Anjani Putra Maha Baldai
संतन के प्रभु सदा सहाई॥Santan Ke Prabhu Sada Sahai
जिनके बल से बड़े-बड़े पर्वत काँप उठते हैं और रोग-दोष जिनके पास तक नहीं फटकते; वे अंजनी के पुत्र महान बल देने वाले हैं, संतों के प्रभु और सदा सहायक हैं।
प्रचलित गायन में 'निकट न झाँके' बोला जाता है; गीता प्रेस के पाठ में 'झाँपै' है।
आरती कीजै हनुमान लला की।Aarti Kijai Hanuman Lala Ki
दुष्टदलन रघुनाथ कला की॥Dusht Dalan Raghunath Kala Ki
दे बीरा रघुनाथ पठाये।De Beera Raghunath Pathaye
लंका जारि सीय सुधि लाये॥Lanka Jari Siya Sudhi Laye
लंका सो कोट समुद्र सी खाई।Lanka So Kot Samudra Si Khai
जात पवनसुत बार न लाई॥Jat Pavansut Bar Na Lai
श्री रघुनाथ जी ने उन्हें बीड़ा देकर भेजा; वे लंका जलाकर सीता जी का समाचार ले आए। लंका जैसा दुर्ग और समुद्र जैसी खाई थी, फिर भी पवनपुत्र को वहाँ जाने में तनिक भी देर नहीं लगी।
'बीड़ा' पान का वह बीड़ा है जो पहले किसी कठिन काम का भार उठाने वाले वीर को दिया जाता था। 'बीड़ा उठाना' मुहावरा इसी से बना है।
आरती कीजै हनुमान लला की।Aarti Kijai Hanuman Lala Ki
दुष्टदलन रघुनाथ कला की॥Dusht Dalan Raghunath Kala Ki
लंका जारि असुर संहारे।Lanka Jari Asur Sanhare
सियारामजी के काज सँवारे॥Siyaramji Ke Kaj Sanvare
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे।Lakshman Murchhit Pade Sakare
आनि सजीवन प्रान उबारे॥Aani Sajivan Pran Ubare
लंका जलाकर उन्होंने असुरों का संहार किया और सिया-राम जी के कार्य सँवारे। जब लक्ष्मण जी मूर्छित पड़े थे और भोर होने को थी, तब वे संजीवनी लाकर उनके प्राण बचा लाए।
मान्यता है कि लक्ष्मण जी के प्राण बचाने के लिए संजीवनी सूर्योदय से पहले पहुँचनी थी, इसीलिए 'सकारे' (भोर) कहा गया।
आरती कीजै हनुमान लला की।Aarti Kijai Hanuman Lala Ki
दुष्टदलन रघुनाथ कला की॥Dusht Dalan Raghunath Kala Ki
पैठि पताल तोरि जम-कारे।Paithi Patal Tori Jam Kare
अहिरावन की भुजा उखारे॥Ahiravan Ki Bhuja Ukhare
बायें भुजा असुर दल मारे।Bayen Bhuja Asur Dal Mare
दहिने भुजा संतजन तारे॥Dahine Bhuja Santjan Tare
पाताल में प्रवेश करके उन्होंने यम के समान भयंकर बंधन तोड़ डाले और अहिरावण की भुजाएँ उखाड़ दीं। बाईं भुजा से उन्होंने असुरों के दल को मारा और दाहिनी भुजा से संतजनों का उद्धार किया।
अहिरावण के प्रसंग में वह राम-लक्ष्मण को पाताल ले जाता है और हनुमान जी उन्हें छुड़ाकर लाते हैं। यह कथा वाल्मीकि रामायण में नहीं है, बाद की रामकथा परंपराओं में मिलती है। 'जम-कारे' के दो अर्थ लिए जाते हैं: यम जैसे बंधन, या पहरेदार।
आरती कीजै हनुमान लला की।Aarti Kijai Hanuman Lala Ki
दुष्टदलन रघुनाथ कला की॥Dusht Dalan Raghunath Kala Ki
सुर नर मुनि आरती उतारे।Sur Nar Muni Aarti Utare
जै जै जै हनुमान उचारे॥Jai Jai Jai Hanuman Uchare
कंचन थार कपूर लौ छाई।Kanchan Thar Kapur Lau Chhai
आरति करत अंजना माई॥Aarti Karat Anjana Mai
देवता, मनुष्य और मुनि उनकी आरती उतारते हैं और 'जय जय जय हनुमान' का उच्चारण करते हैं। सोने के थाल में कपूर की लौ जगमगा रही है और माता अंजना स्वयं उनकी आरती कर रही हैं।
आरती कीजै हनुमान लला की।Aarti Kijai Hanuman Lala Ki
दुष्टदलन रघुनाथ कला की॥Dusht Dalan Raghunath Kala Ki
जो हनुमानजी की आरति गावै।Jo Hanumanji Ki Aarti Gavai
बसि बैकुंठ परमपद पावै॥Basi Baikunth Param Pad Pavai
जो हनुमान जी की यह आरती गाता है, वह बैकुंठ में वास करके परम पद प्राप्त करता है।
गीता प्रेस में 'हनुमान (जी)' छपा है, अर्थात 'जी' वैकल्पिक है। अनेक प्रचलित गायनों में यहाँ एक और पंक्ति जोड़ी जाती है जो गीता प्रेस के पाठ में नहीं है: 'लंक विध्वंस किये रघुराई। तुलसीदास स्वामी कीरति गाई॥'
आरती कीजै हनुमान लला की।Aarti Kijai Hanuman Lala Ki
दुष्टदलन रघुनाथ कला की॥Dusht Dalan Raghunath Kala Ki
पूर्ण
श्री हनुमान जी की आरती का पाठ पूर्ण हुआ।
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प्रश्न
हनुमान जी की आरती कब गानी चाहिए?
पूजा के अंत में, प्रायः हनुमान चालीसा के ठीक बाद। मंगलवार और शनिवार इसके परंपरागत दिन हैं, और हनुमान जयंती पर इसे ख़ास उत्साह से गाते हैं। बहुत से परिवार रोज़ सुबह या शाम घर के मंदिर में इसे गाते हैं।
'आरती कीजै हनुमान लला की' किसने लिखी?
इसके रचयिता का नाम कहीं दर्ज नहीं है। यह पारंपरिक आरती है, जो मंदिरों और घरों में गाते-गाते पीढ़ियों से चली आ रही है। कुछ प्रचलित रूपों के अंत में तुलसीदास के नाम वाली पंक्ति आती है, इसलिए कुछ लोग इसे उनसे जोड़ते हैं। पर वह पंक्ति गीता प्रेस के पाठ में नहीं है, और तुलसीदास जी ने यह आरती लिखी, इसका कोई पक्का प्रमाण नहीं है।
'दुष्टदलन रघुनाथ कला की' का क्या अर्थ है?
इसमें हनुमान जी को दुष्टों का दलन करने वाला और श्री रघुनाथ जी की 'कला' कहा गया है, यानी श्रीराम की अपनी शक्ति। भक्त मानते हैं कि हनुमान जी का बल श्रीराम का ही बल है, जो उनके सेवक के रूप में काम करता है।
घर पर हनुमान जी की आरती कैसे करें?
थाली में घी का दीया या कपूर जलाएँ। हो सके तो घंटी बजाएँ, और गाते हुए हनुमान जी की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक को घड़ी की दिशा में घुमाएँ। हर पद के बाद टेक दोहराएँ। आरती के बाद सब लोग लौ पर हथेलियाँ घुमाकर आँखों से लगाते हैं।
क्या आरती से पहले चालीसा पढ़ना ज़रूरी है?
नहीं। बहुत से परिवार पहले चालीसा पढ़ते हैं और फिर आरती करते हैं, क्योंकि आरती से पूजा पूरी होती है। आरती अकेले भी गा सकते हैं।
आरती में हनुमान जी को 'लला' क्यों कहा गया है?
'लला' प्यारे छोटे बच्चे को कहते हैं। आरती हनुमान जी को उसी दुलार से पुकारती है, जैसे माँ अपने बच्चे को पुकारती है।
स्रोत और समीक्षा
स्रोत: Shri Hanumanji ki Aarti, Gita Press Gorakhpur reading (appendix to Gita Press's Shri Ramcharitmanas; scanned copy on archive.org), cross-checked with bhaktibharat.com and hindi.webdunia.com
We group the couplets after the refrain in pairs, as the aarti is commonly sung, with the refrain repeated after each; the last verse is a single couplet. Gita Press readings kept: 'jhanpai' (popular 'jhanke'), 'Siya' as सीय, 'Sajivan'. Word spacing is normalised (e.g. सियारामजी के). The popular closing couplet 'लंक विध्वंस किये रघुराई…' is not in the Gita Press text and is given in a note.
मूल पाठ को यहाँ बताए गए स्रोतों से पंक्ति-दर-पंक्ति मिलाया गया है। अर्थ AI की मदद से लिखा गया मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है।
ये अर्थ हमारा पहला मसौदा हैं। अभी किसी विद्वान ने इनकी जाँच नहीं की है। कोई भूल दिखे तो हमें ज़रूर बताएँ।